मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सैलाब को आवाम की तरह महसूस किया है। वह खुद भी बाढ़ में घिर गए थे और 36 घंटे तक उनका अपने मंत्रियों और अफसरों के भी कोई संपर्क नहीं था। तीन दिनों तक सरकार नाम की कोई तंत्र उनके पास नहीं रहा। बाद में अपने ही तंत्र को समेटकर राहत और बचाव के लिए खुद उतरे।
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सैलाब के बाद अब कश्मीर के पुनर्निमाण की चुनौती उनके सामने है। अमर उजाला के समाचार संपादक राघवेंद्र नारायण मिश्र से घंटे भर की बातचीत में उन्होंने कश्मीर की दिक्कतों का साझा किया और अपनी कोशिशों की गंभीरता भी बताई। प्रस्तुत है उमर से बातचीत के प्रमुख अंश :
सैलाब की तबाही के निशान हर जगह मौजूद हैं। सरकारी तंत्र सक्रिय है लेकिन कहीं-कहीं कमी भी साफ दिखती है। सरकार के मुखिया के नाते अब आपकी प्राथमिकता क्या है?
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मुश्किलात कम जरूर हुए हैं लेकिन खत्म नहीं हुए हैं। अब भी कई इलाकों में पानी जमा है. राजबाग और जवाहरनगर में हालत ठीक नहीं है। सरकार के पास पूरी जानकारी है और हम खुद मौके पर जाकर पानी निकालने की कोशिशों को जायजा ले रहे हैं।
बेमिना में जलभराव है। पंप लगाए गए हैं जो दिन रात काम कर रहे हैं। कुछ जगह बंध को काटा है। पहले पानी पूरी तरह बाहर निकल जाए। तब आगे की अन्य कोशिशें वहां शुरू होंगी।
'अब सरकार राशन बांटने का काम नहीं कर रही है'
पानी वाले इलाकों के लोग कहां हैं? उनके लिए खाने-पीने का इंतजाम क्या हुआ है?
अब उतना पानी नहीं है कि डूबने के हालात हों। गलियों में पानी है। मुख्य सड़क से बाहर निकल चुका है। अधिकांश लोग अपने घरों में ही हैं। कुछ वैसे लोग जिनके मकान गिरे हैं या मकान में रहने में खतरे की स्थिति थी।
उन्हें टेंटों में भी रखा गया है। खाने-पीने के इंतजामात किए गए हैं। राशन दिया जा रहा है। गैरसरकारी संगठन भी काम कर रहे हैं।
डल लेक अंदर वाली बस्तियों, राजबाग, जवाहरनगर और तमाम इलाकों में अमर उजाला की टीम के सामने लोगों ने राहत नहीं मिलने की शिकायत की। सरकार से नाराज हैं लोग। राशन वितरण में गड़बड़ियों की शिकायतें भी आईं। इसकी जांच हुई है?
अब सरकार ज्यादातर जगहों पर राशन बांटने का काम नहीं कर रही है। शिकायतें मेरे पास भी आईं थीं और आती हैं। दरअसल जरूरत जितनी है उसके हिसाब से उन्हें मदद कम लगती है। पहले दिन से ही राहत सामान बांटे जा रहे हैं।
यह संभव है कि कुछ मुलाजिमों ने नाजायज फायदा लिया हो। कुछ लोगों ने भी एक बोरी अनाज की जगह की जगह अधिक रख लिए हों। इससे दूसरों का हिस्सा प्रभावित हुआ। इन गड़बड़ियों को रने के लिए मानिटरिंग की जा रही है।
अब सरकार राशन नहीं बांटेगी तो वैकल्पिक तंत्र कौन सा होगा?
अब सरकार राशन नहीं बांटेगी तो वैकल्पिक तंत्र कौन सा होगा?
एनजीओ को काम पर लगाया है। डिविजनल कमिश्नर के दफ्तर में एक विशेष सेल बनाया गया है जो एनजीओ के बीच समन्वय स्थापित करेगा। ऐसा नहीं हो कि एक ही जगह कई एनजीओ पहुंच जाएं। सबको समान रूप से राहत राशन और जरूरी सामान मुहैया कराने के लिए डिव काम का सेल मानिटरिंग कर रहा है।
एक आदमी को अभी 50 किलो अनाज देना है। कोई छूट नहीं जाए और वंचित इलाके पूरी तरह कवर हो जाएं इस पर सरकार नजर रख रही है। जो इलाके वंचित हैं उनपर फोकस किया जाएगा।
राहत के लिए और बैंकों के लोन के लिए पुराने तरीके आजमाए जा रहे हैं। जिनके राशन कार्ड और वोटर कार्ड भी पानी में डूब गया, वैसे लोग अपनी पहचान कैसे साबित करेंगे? क्या वैसे लोग राहत से छूट जाएंगे?
नहीं ऐसा नहीं होगा। पहले तो बगैर किसी सबूत को हासिल किए राहत सामान दिए गए हैं. जहां राशन कार्ड की जरूरत होगी तो उसके लिए विशेष इंतजाम किए जाएंगे। विसेष कैंप लगाकर राशन कार्ड बनाए जाएंगे। उन्हें दस्तावेज तुरंत उपलब्ध कराया जाएगा।
जो कर्मचारी काम पर नहीं लौटे उनको दंडित करेंगे?
सचिवालय अभी तक फंक्शनल नहीं हुआ है। काम प्रभावित तो नहीं हो रहा? आपने नीचे देखा होगा। सचिवालय को पूरी तरह फंक्शनल बनाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। निचली मंजिल में सफाई का काम अभी चल ही रहा है। मैं भी सीढ़ियों से ही ऊपर आता रहा। लिफ्ट नहीं चल रहा था। हमने युद्दस्तर पर काम किया है। अब सचिवालय धीरे-धीरे पूरी तरह फंक्शनल होने की ओर है।
अभी तक कई कर्मचारी काम पर नहीं लौटे हैं। उनको दंडित करेंगे? वेतन रोकने की चेतवानी दी गई है। लेकिन अब अधिकांश वापस आ गए हैं। जम्मू के मुलाजिमों के साथ थोड़ी दिक्कत थी। उनके लिए जहां रहने का इंतजाम किया था वहां पानी भर गया। अब वैकल्पिक इंतजाम उन्हें मुहैया कराया जा रहा है। मुकर्रर जगहों की जगह नए आवास दिए गए हैं। नए होटलों में ठहराया जा रहा है।
नुकसान कितने का हुआ? केंद्र का रूख कैसा है?
अभी कुछ दिन पहले आप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिलकर आए हैं। केंद्रीय मंत्रियों राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और हर्षवर्धन के दौरे हो चुके हैं। केंद्र का रूख कैसा है?
उन्होंने अबतक संवेदनशीलता दिखाई है। केंद्र से हमें वह सबकुछ मिल रहा है जो हमने मांगा है। मोदी साहब से भी मुलाकात बहुत अच्छी रही है। उन्होंने हर संभव मदद का वादा किया है। अभी तात्कालिक जरुरतों के हिसाब से सहायता आई है। आगे और बात होगी।
नुकसान कितने का हुआ? क्या एकसट्र आडिनरी पैकेज मिलने के संकेत हैं?
हम अबतक आंकड़े ही जुटा रहे हैं। रिपोर्ट मंगाई गई है। श्रीनगर में तो अभी आकलन भी मुश्किल है। कई जगह पानी भरा है। सभी जगह और विभागों के आंकड़े आ जों तब हम मैमोरेंडम बनाकर प्रधानमंत्री को सौंपेंगे जिसमें विशेष पैकेज की मांग होगी।
अर्थव्यवस्था को भी बड़ा नुकसान हुआ है। इसका आकलन किया है?
हमारी अर्थव्यवस्था हिल गई है। संभलने में वक्त लगेगा। हमारी खेती और हमारे फल उद्योग तबाह हैं। नुकसान बड़ा है। केंद्र से बड़ी मदद की जरुरत है। इंफ्रास्ट्रक्चर ध्वस्त है। सेना ने कुछ जगहों पर सड़कें बहाल की हैं लेकिन मजबूत ढ़ांचा कढ़ा करने में समय और धन की जरूरत है।