पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद अब जम्मू-कश्मीर के चुनाव पर सभी की निगाहें टिक गई हैं। हालांकि, प्रदेश में चुनाव की कोई घोषणा नहीं हुई है, लेकिन गृहमंत्री अमित शाह के छह से आठ महीने में चुनाव कराने संबंधी बयान के बाद यह माना जा रहा है कि इस साल के आखिर तक प्रदेश में निर्वाचित सरकार हो सकती है। इसी बीच, प्रदेश में सियासी गतिविधियां तेज हो गई हैं।
अनुच्छेद 370 हटने के बाद नए जम्मू-कश्मीर में हो रहे पहले चुनाव में जीत हासिल करना भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न होगा तो इसे नकारने वाली कश्मीर केंद्रित पार्टियों नेकां व पीडीपी के लिए भी अपने अस्तित्व को बचाने की खातिर यह महत्वपूर्ण होगा।
इस साल के आखिरी तक जम्मू-कश्मीर के साथ ही हिमाचल प्रदेश व गुजरात के चुनाव भी संभावित हैं, लेकिन इनमें से जम्मू-कश्मीर के चुनाव में सबसे अधिक लोगों की निगाहें होंगी। कारण अनुच्छेद 370 को भाजपा ने पूरे देश में भुनाया है। वह इसे विकास के रास्ते में बाधक बताते हुए आतंक का जनक भी बताती रही है।
वहीं, जम्मू-कश्मीर में हुए डीडीसी चुनाव भी इसी मुद्दे पर गुपकार गठबंधन ने लड़े। इस गठबंधन में कश्मीर केंद्रित नेकां व पीडीपी प्रमुख रूप से शामिल हैं। इस चुनाव में भाजपा ने सबसे अधिक सीटें जीतीं। गुपकार गठबंधन ने खुलेआम अनुच्छेद 370 हटाने के खिलाफ वोट मांगे।
केंद्रीय विश्वविद्यालय जम्मू के डॉ. बच्चा बाबू का कहना है कि अब आने वाले दिनों में जम्मू-कश्मीर का चुनाव केंद्र बिंदु में होगा क्योंकि पक्ष और विपक्ष दोनों ही 370 को ही मुद्दा बनाकर तस्वीर पेश करेंगी। देश-दुनिया की निगाहें इसलिए होंगी कि आखिर यहां की जनता 370 को लेकर क्या सोचती है। क्या यह यहां की तस्वीर बदलने में सहायक है या फिर लोग पुरानी व्यवस्था ही चाहते हैं, इसका निर्धारण भी चुनाव परिणामों से होगा।
परिसीमन आयोग ने अपना काम लगभग पूरा कर लिया है। आने वाले कुछ दिनों में विधानसभा हलकों के निर्धारण का मसौदा सार्वजनिक कर उस पर जनता की आपत्तियां मांगी जाएंगी। आपत्तियों व सुझावों को निस्तारित करने के बाद मसौदे को अंतिम रूप दिया जाएगा। आयोग का कार्यकाल छह मई तक है। ऐसे में इससे पहले रिपोर्ट सार्वजनिक हो जाएगी।