गत आठ अप्रैल को जैश कमांडर सज्जाद डार के सोपोर में जनाजे में करीब 500 से अधिक लोग लॉकडाउन के नियमों का उल्लंघन कर जनाजे में शामिल हुए थे। इसमें पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर 40 से अधिक लोगों को गिरफ्तार भी किया था। इसके बाद सार्वजनिक जनाजों पर प्रतिबंध लगाने का फैसला लिया गया।
इसके बाद से पुलिस की निगरानी में कुछ परिवार वालों की राय के साथ स्थानीय आतंकियों को भी शीरी बारामुला और गांदरबल जिले के सोनमार्ग में दफनाया गया जहां पहले केवल विदेशी आतंकियों को दफनाया जाता रहा है। सूत्रों के मुताबिक पिछले करीब 18 मुठभेड़ों के दौरान केवल 14 बार ही परिवार वालों को जनाजों में शामिल होने का मौका मिल पाया है।
हर जनाजे के बाद 4-5 युवा आतंक की राह थाम लेते हैं
पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि 2015 में कुलगाम में मारे गए लश्कर कमांडर अबू कासिम के जनाजे में उमड़ी हजारों की भीड़ को देखते हुए यह फैसला लिया गया था कि किसी भी विदेशी आतंकी के शव को स्थानीय लोगों को नहीं सौंपा जाएगा। कासिम पर 20 लाख का इनाम था।
उसके बाद कई स्थानीय आतंकियों के जनाजों में भी भीड़ उमड़ना शुरू हुई थी। इसके बाद पुलिस ने आतंकियों के शव देर शाम सौंपने शुरू किए थे ताकि रात में ही जनाजा अंजाम दिया जाए और किसी तरह की कानून व्यवस्था की स्थिति न पैदा हो, लेकिन उसके बाद भी स्थानीय आतंकियों के जनाजों में भीड़ उमड़ती रही। यही नहीं बंदूकें लहराते हुए सलामी भी जाती रही। इससे प्रभावित होकर युवा आतंक की राह अपनाते थे।
औसतन चार से पांच युवा तो हर जनाजे के बाद आतंक की राह में शामिल होते आए हैं। इनमें अधिकतर दक्षिणी कश्मीर के थे जोकि सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बना रहा। अब इन प्रतिबंधों के चलते स्थानीय आतंकियों की भर्ती के ग्राफ में और कमी आने की उम्मीद है। इतना ही नहीं घाटी में साइबर सेल भी अब पूरी तरह से सतर्क हो चुका है। सोशल मीडिया पर हर जगह नजर रखी जा रही है। साइबर सेल के एक अधिकारी के अनुसार पहले हिज्ब कमांडर बुरहान वानी ने युवाओं को प्रभावित करने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया। इसके बाद अन्य आतंकी भी ऐसा कर रहे हैं।