मुफ्ती सरकार में कठुआ में थाने पर पहला फिदायीन हमला कई बातों की ओर इशारा करता है। पहला कठुआ और सांबा से अफस्पा हटाए जाने की कोशिशों के बीच हमले से स्पष्ट हो गया है कि आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट (अफस्पा) हटाने का यह उचित समय नहीं है। सीमांत इलाकों में सेना ही लाइफलाइन है।
हमले के बाद सेना ने ही मोर्चा संभालकर आतंकियों को ढेर किया और स्थिति को काबू में किया। अब भी इस इलाके में अमन तथा शांति के लिए सेना का होना जरूरी है। सीमा पार 60 आतंकियों के घुसपैठ की तैयारी में बैठे होने की खुफिया सूचना भी इस हमले से पुष्ट होती है।
लंबे समय से घुसपैठ में विफल रहने से बौखलाए आईएसआई तथा आतंकी संगठनों ने फिदायीन हमले की साजिश रची। तीसरा पाक डे पर 23 मार्च को दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में हुर्रियत नेता मीरवाइज उमर फारूक के शामिल होने से दो दिन पहले फिदायीन हमला भी बहुत कुछ इशारा करता है।
यह हमला उस वक्त हुआ है जब आक्ट्राय पोस्ट पर दोनों देशों के बीच हुई फ्लैग मीटिंग में शांति तथा अमन बहाल रखने पर बल दिया गया।