साल गुजर गया, लेकिन जख्म इतना गहरा है कि उसे भरने में शायद वर्षों भी कम पड़ जाए। अपनों के जिंदा दफन होने और आशियाने जमींदोज होने का वह खौफनाक मंजर याद कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
उन भयानक यादों से नींद उड़ जाती है। ऐसे दर्द बयां कि उस सद्दल गांव के पीडि़तों ने जिन्हें सितंबर माह में आई आपदा ने उजाड़ कर रख दिया। कड़ाके की ठंड में भी वे टेंटों या फिर इधर-उधर समय काटने को मजबूर हैं।
आर्य समाज उधमपुर में एकल विद्यालय अभियान के तहत सहायता राशि प्राप्त करने पहुंचे पीडि़तों की आंखों में आज भी उस खौफ का मंजर साफ स्पष्ट नजर आ रहा था। आपदा ने कई के पूरे परिवार को ही निगल लिया।
खुद को बड़ी मुश्किल से हौसला देती करीब 70 साला धामी देवी ने बताया कि उसका हंसता-खेलता पूरा परिवार ही इस हादसे की भेंट चढ़ गया। वह घर पर मौजूद नहीं थी, जिससे वह बच गई। लेकिन हादसे के वक्त घर में मौजूद उसके परिवार का एक बच्चा तक नहीं बच पाया।