विलेज एग्रीकल्चर एक्सटेंशन असिस्टेंट को नियमित करने के संबंध में दायर तमाम याचिकाओं को हाईकोर्ट के जस्टिस जनक राज कोतवाल ने विभिन्न निर्देश देते हुए बंद कर दिया। याचिकाओं के अनुसार वर्ष 2007 में सरकार ने बेरोजगार कृषि स्नातकों को रहबर-ए-जिरात के रूप में जोड़ा था।
सरकार ने अब नई पालिसी बनाते हुए उन्हें विलेज एग्रीकल्चर एक्सटेंशन असिस्टेंट के रूप में नियमित करने का फैसला लिया। नियमित करने की प्रक्रिया के खिलाफ सात याचिकाएं दाखिल हुईं। जस्टिस ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पाया कि याचिकाकर्ता कृषि स्नातक हैं और वर्ष 2006 में बेरोजगार थे।
सरकार की कैबिनेट ने फैसला लेते हुए उन्हें रहबर-ए-जिरात योजना से जोड़ा। जज ने पाया कि यह कभी पालिसी में नहीं था कि इन्हें मेरिट लिस्ट या वरिष्ठता के आधार पर नियमित किया जाएगा।
कैबिनेट ने फैसला लिया कि उन्हें तीन सालों में तीन फेज में नियमित किया जाएगा। साथ ही उच्च शिक्षा करे आधार पर सूची तैयार की गई। कैबिनेट ने फैसला लिया कि 31 अक्तूबर 2006 को हासिल की गई उच्च शिक्षा वालों को प्राथमिकता दी जाएगी।
अदालत ने कहा कि इस क्रम में कहीं भी भेदभाव नहीं हुआ। साथ ही रहबर-ए-जिरात में जुड़ने के बाद किसी ने उच्च शिक्षा हासिल की, उसे प्राथमिकता में नहीं जोड़ा गया। तमाम बातों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने याचिकाओं को बंद करने का आदेश दिया।