आतंक के पोस्टर बॉय सब्जार भट की मुठभेड़ में मौत के बाद सुरक्षा बलों ने हिंसा पर काबू पाने को त्रिसूत्रीय फार्मूला पर अमल शुरू किया है। आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर में छह माह तक चली हिंसा से सबक लेते हुए सुरक्षा बलों ने इस बार पहले दिन से ही सख्ती शुरू कर दी है। इसके सकारात्मक परिणाम भी मिल रहे हैं।
बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर घाटी में कर्फ्यू और कर्फ्यू जैसी पाबंदियां लगाने में देर हुई थी। रियासत सरकार ने प्रदर्शनों पर सख्ती नहीं करने के निर्देश दिए थे। इससे उपद्रवियों को संगठित रूप से हिंसा फैलाने और स्कूलों को जलाने के लिए दस्ते तैयार करने का मौका मिल गया। इस बार पिछली गलतियों से सबक लेते हुए शुरुआत से ही सख्ती ने घाटी में असर दिखाना शुरू कर दिया है।
सब्जार की मौत के दूसरे दिन से ही हिंसा घट गई है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने रियासत सरकार को हिंसा रोकने के लिए कारगर उपाय करने और सुरक्षा बलों को हर स्तर पर सहयोग के लिए एडवाइजरी जारी की है।
सेना और आतंकियों में मुठभेड़
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सुरक्षा बलों के सूत्रों का कहना है कि इस बार त्रिसूत्रीय फार्मूले के तहत अलगाववादियों पर शिंकजा, आतंकियों का सफाया और उपद्रवियों पर सख्ती की नीति अमल में लाई जा रही है। इस नीति के अमल के लिए सेना, सुरक्षा बल, पुलिस और सभी तरह की एजेंसियों में बेहतर तालमेल से काम की कोशिश हो रही है।
एनआईए की जांच में अलगाववादियों के घिरने का भी असर पड़ा है। बिट्टा कराटे, जावेद बाबा और नईम खान के अलावा सैयद अली शाह गिलानी तक सभी स्तर के अलगाववादियों को अब लंबी पूछताछ की प्रक्रिया से गुजरना होगा। अलगाववादियों को उनके घरों में कैद रखा जाएगा, ताकि उपद्रवियों और किराए के पत्थरबाजों से उनका सीधा संपर्क नहीं बन सके।
घुसपैठ रोकने के लिए एलओसी और बार्डर पर अलर्ट जारी कर निगरानी रखी जा रही है। इसके अलावा घाटी में मौजूद आतंकियों को कासो के तहत खोजकर मारने की नीति पर अमल शुरू हुआ है। इस घेराबंदी के कारण उपद्रवियों को हिंसक प्रदर्शनों से रोकने में कुछ सफलता मिली है, लेकिन चुनौती बरकरार है।
गांवों में आतंकियों और अलगाववादियों के एजेंट सक्रिय हैं। हिजबुल मुजाहिदीन का दक्षिम कश्मीर के ग्रामीण क्षेत्रों में खासा असर है। इसी तरह उत्तरी कश्मीर में पाकिस्तानी आतंकियों का खौफ रहा है। इसलिए लगातार चौकसी बरती जा रही है।