मौलवी मोहम्मद अशरफ ने बताया कि सूफीवाद एक विचारधारा है। यह भाईचारे, सांप्रदायिक सद्भाव और सभी से प्यार करने का संदेश देती है। यही कश्मीरियत की नींव है।
आतंकवादी हमले में घायल होने के कारण दो साल तक बिस्तर पर रहे मौलवी मोहम्मद अशरफ ने पूरा जीवन सूफीवाद को मजबूत करने में लगा दिया है। उनका मानना है कि इससे आतंकवाद प्रभावित जम्मू कश्मीर में कट्टरपंथ से निपटने में सफलता मिल सकती है। दक्षिण कश्मीर के बिजबेहरा के गुरी गांव निवासी अशरफ 1994 से सूफी संस्कृति को पुनर्जीवित करने की दिशा में कर रहे हैं।
विज्ञापन
उन्होंने अवंतीपोरा स्थित इस्लामिक विश्वविद्यालय और राजोरी के बाबा गुलाम शाह बादशाह विश्वविद्यालय में सूफी पाठ्यक्रम की शुरुआत करवाई। अशरफ ने बताया कि सूफीवाद एक विचारधारा है। यह भाईचारे, सांप्रदायिक सद्भाव और सभी से प्यार करने का संदेश देती है। यही कश्मीरियत की नींव है।
उन्होंने इस पर दो किताबें भी लिखी हैं। उन्होंने 2016 में आतंकवाद प्रभावित शोपियां में पहला सूफी सम्मेलन ‘बैक टू पैराडाइज’ आयोजित किया था, जिसमें 80 धार्मिक उपदेशकों सहित सैकड़ों लोग शामिल हुए थे। अशरफ ने कहा कि उनका परिवार कट्टरपंथ से सबसे ज्यादा प्रभावित परिवारों में से एक है।