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लोकसभा चुनाव: 370 की जंजीरें टूटीं, कई अलगाववादियों ने मुख्य धारा की पार्टियों का दामन थामा, अब मांगेंग वोट

Fri, 15 Mar 2024 05:57 PM IST
kumar गुलशन कुमार डॉ. बृजेश कुमार सिंह जम्मू

सार

पांच साल पहले जब जम्मू-कश्मीर में लोकसभा के चुनाव हुए थे तो कश्मीर में अलगाववाद, आतंकवाद चरम पर था। पाकिस्तान के इशारे पर बहिष्कार की कॉल दी जाती थी। लोगों को मतदान करने से रोका जाता था। बूथ तक पहुंचने में लोगों को डर बना रहता था।
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अनुच्छेद 370 - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पिछले पांच साल में नए जम्मू-कश्मीर का जन्म हुआ है। इसमें पाकिस्तान प्रायोजित पत्थरबाजी व हड़ताल बीते दिनों की बात हो गई है। अलगाववाद हाशिये पर है। आतंकी घटनाओं में काफी कमी आई है। हालांकि, पाकिस्तान की ओर से बार-बार जम्मू-कश्मीर में अमन-चैन को खराब करने की कोशिश की जा रही है, लेकिन अपने मंसूबे में वह कामयाब नहीं हो पा रहा है।

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अब तो सक्रिय अलगाववादी भी मुख्यधारा में लौटने लगे हैं। कई ने मुख्यधारा की पार्टियों का दामन थाम लिया है। इस चुनाव में अलगाववादी नेता भी चुनाव प्रचार करते और अवाम से वोट मांगते नजर आ सकते हैं। इस बदली आबोहवा में लोकसभा चुनाव कई मायने में महत्वपूर्ण होंगे।

बदली परिस्थितियों में जो सबसे बड़ा बदलाव आया वह यह है कि जो कभी भारत के नारे नहीं लगाते थे, जिनका भारतीय झंडे पर विश्वास नहीं था, वे भी अब अलगाववाद को छोड़कर मुख्यधारा में शामिल होने लगे हैं। हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता रहे जफर हबीब डार अपनी पार्टी में शामिल हो गए हैं। वह कट्टरपंथी सैय्यद अली शाह गिलानी के हुर्रियत कांफ्रेंस में दूसरी पंक्ति के नेता थे।

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हुर्रियत कांफ्रेंस के घटक रहे इतिहादुल मुस्लिमीन के महासचिव सैयद मुजफ्फर रिजवी भी 2023 में अपनी पार्टी में शामिल हुए। बाद में इन्हें पार्टी ने कश्मीर का प्रांतीय उपाध्यक्ष बनाया। अभी और कुछ अलगाववादी मुख्यधारा में शामिल हो सकते हैं। सबसे बड़ी बात है कि आम मतदाताओं को वोट डालने से रोकने के लिए न तो कोई फतवा जारी होने की आशंका है और न ही उन्हें मतदान करने से रोके जाने के आसार। यह खासकर कश्मीर में लोकतंत्र के पर्व के लिए अच्छा संकेत दे सकता है।

दरअसल पांच साल पहले जब जम्मू-कश्मीर में लोकसभा के चुनाव हुए थे तो कश्मीर में अलगाववाद, आतंकवाद चरम पर था। पाकिस्तान के इशारे पर बहिष्कार की कॉल दी जाती थी। लोगों को मतदान करने से रोका जाता था। बूथ तक पहुंचने में लोगों को डर बना रहता था।
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आतंकवादी किसी भी गांव में डेरा डाले दिख जाते थे। दीवारों पर बहिष्कार के नारे लिखे होते थे। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव के लगभग तीन महीने बाद स्थितियां बिल्कुल बदल गईं। अनुच्छेद 370 और 35ए की बंदिशें केंद्र सरकार ने हटा दीं। इससे अलगाववाद की आवाज दब गई और अलगाववादियों के सुर बदल गए। हड़ताल के कैलेंडर जारी होने बंद हो गए।

सड़कों से पत्थरबाज और पत्थरबाजी गायब हो गई। दुकानें और स्कूल नियमित रूप से खुलना शुरू हो गए। आतंकवादी घटनाओं में जबरदस्त कमी आई। तीन दशक से अधिक समय से बंद फिल्म संस्कृति शुरू हो गई। सिनेमा हॉल खुल गए। नाइट लाइफ शुरू हो गई।

देर रात तक डल झील तथा झेलम किनारे युवक-युवतियां घूमते दिखने लगे। सूरज ढलते ही सन्नाटे में समा जाने वाला लाल चौक देर रात तक आबाद रहने लगा है। अब इतनी बदली हुई तस्वीरों में चुनाव होने जा रहा है। ऐसे में माना जा रहा है कि इस बार बेखौफ होकर लोग घरों से बाहर निकलेंगे जिससे वोटिंग प्रतिशत भी बढ़ सकता है।

पाकिस्तान प्रायोजित घटनाएं
  • घटनाएं         2018   2024 (फरवरी तक)
  • पत्थरबाजी    1221   00
  • हड़ताल        52      00
कानून व्यवस्था में सुधार (कमी फीसदी में)
  • पत्थरबाजी                   100%
  • आतंकी घटनाओं           69%
  • नागरिकों की मौत          81%
  • सुरक्षा बलों की मौत        47%
  • चुनाव निष्पक्ष और शांतिपूर्ण कराने के सभी प्रबंध किए जाएंगे। मतदाताओं को मतदान केंद्रों तक पहुंचने के लिए सुरक्षित व निर्भिक माहौल मुहैया कराया जाएगा। उनमें यह विश्वास जगाया जाएगा कि वह पूरी तरह सुरक्षित हैं। बिना किसी खौफ के लोकतंत्र का उत्सव मनाने के लिए मतदान केंद्रों तक पहुंच सकते हैं। मतदाताओं के विश्वास तथा सुरक्षा के लिए सभी प्रबंध किए जाएंगे। -आरआर स्वैन, डीजीपी।

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