टीवी चैनलों और केबल नेटवर्क पर चलने वाले अश्लील और झूठे विज्ञापनों के खिलाफ दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस एन पाल वसंथाकुमार और जस्टिस बंसी लाल भट की खंडपीठ ने रियासत के मुख्य सचिव और कानून सचिव को आवश्यक निर्देश जारी किए हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार टीवी चैनल पर चलने वाले विज्ञापनों में केबल टेलीविजन नेटवर्क (रेगूलेशन) एक्ट 1995 के एडवरटाइसिंग कोड और प्रोग्राम कोड का उल्लंघन हो रहा है।
खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद चीफ जस्टिस को कहा कि उचित कानून बनाकर फर्जी विज्ञापनों से अवाम के हितों की रक्षा सुनिश्चित की जाए। विज्ञापनों में उत्पादकों के सामानों के प्रति आकर्षित करने के लिए अश्लील विज्ञापनों का सहारा लिया जाता है जो परिवार के साथ बैठकर देखन असहज है। इस तरह वूमेन प्रोबिशन एक्ट का भी उल्लंघन है।
इसके अलावा कुछ विज्ञापनदाता और टीवी चैनल देश भर में कार्यक्रम दिखाकर मैजिकल दवाओं का प्रचार कर रहे हैं, जो ड्रग एंड मैजिक रेमेडी एक्ट 1954 का भी उल्लंघन है। चूंकि यह एक्ट जम्मू कश्मीर में लागू नहीं होती, इसलिए याचिकाकर्ता ने अदालत से अपील की है कि सरकार को नया कानून ड्राफ्ट करने के लिए निर्देश दें।
याचिकाकर्ता के अनुसार केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने हलफनामा दायर कर बताया कि केबल टेलीविजन नेटवर्क रेगूलेशन एक्ट में प्राइवेट सेटेलाइट या टीवी चैनल द्वारा प्रसारित कार्यक्रम या विज्ञापन का प्री सेंशरशिप अधिकार नहीं है, लेकिन एक्ट के सेक्शन 5 में यह प्रावधान है कि कोई व्यक्ति केबल सर्विस के मार्फत कोई कार्यक्रम तब तक पुन: संचारित नहीं कर सकता है, जब तक प्रोग्राम कोड प्रभावी नहीं किया जाता।
खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्रालय ने 21 अगस्त 2014 को एक पत्र जारी कर बताया कि एडवरटाइसमेंट स्टैंडर्ड काउंसिल आफ इंडिया ने गौर किया कि कुछ विज्ञापनों के संबंध में उपभोक्ता शिकायत प्राधिकरण को शिकायतें मिली हैं। अत: मुख्य सचिव नया कानून बनाकर लोगों के अधिकारों की सुरक्षा करें। जेएनएफ