जम्मू में सदी की सबसे बड़ी त्रासदी में नदियों के सैलाब ने जहां कहर ढाया, वहीं पहाड़ी इलाकों में पहाड़ों ने सितम ढाया। मैदानी इलाकों में अगर बाढ़ ने कहर ढाया है तो पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन ने सोते हुए लोगों को जमींदोज कर दिया।
भूस्खलन से कई गांव मुख्य शहरों से कट गए हैं। पहाड़ियों को काटकर बनाए गए रास्ते कहीं दिखाई नहीं पड़ते। मिटटी के कच्चे घर टूट गए हैं। पस्सियां गिरने से मवेशी दब गए। लोगों की जान बची है लेकिन घरों में खाने के लिए कुछ नहीं बचा है।
दूरदराज क्षेत्रों में हालात अभी भी बदतर बने हैं। राजोरी के पहाड़ी गांव सोंगड़ी, पतरेडू में रहने वाले लोग पूरी तरह से सेना द्वारा पहुंचाई जाने वाली राहत सामग्री पर आश्रित हो गए हैं।
कमाई के लिए पोल्ट्री फार्म खोला था और...
पतरेडू के जमेल सिंह का मकान गिर गया। कमाई के लिए पोल्ट्री फार्म खोला था लेकिन पहाड़ी से मिट्टी गिरी तो 300 मुर्गे नीचे ही दब गए। दो गायें और चार भैंसे भी मारी गईं। न अब सिर पर छत बची है, न जेब में पैसे और न ही घर में अनाज।
ऐसा हाल सिर्फ उसी का ही नहीं है, बल्कि गांव के हर उस शख्स का है, जिसका कच्चा मकान है। संगोड़ी के नजामदीन की हालत भी इससे अलग नहीं है। मकान गिरने से उनकी बीवी अश्मजात को काफी चोट लगी है।
रास्ते बंद होने के कारण राजोरी नहीं जा सकते। सेना द्वारा जो दवाइयां और मदद दी जा रही है, लोग उसी पर पूरी तरह से निर्भर हैं। हेलिकाप्टर की आवाज सुनते ही संगोढ़ी हैलीपैड पर आसपास के लोग जमा हो जाते हैं, ताकि उनके खाने का जुगाड़ हो सके।