लाक्रुक ने कहा, 'अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद शुरुआत में जश्न मनाया गया। लेकिन फिर हमें एहसास हुआ कि यह हमारे लिए अच्छा नहीं है।'
उन्होंने कहा कि विभिन्न सामाजिक, धार्मिक और अन्य संगठनों ने लद्दाख के मुद्दों को लेकर एकजुट होने शुरू हुए। नतीजतन लेह एपेक्स बॉडी (एलएबी) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) एक साथ आए। उनके प्रतिनिधि चार प्रमुख मांगों - छठी अनुसूची, राज्य का दर्जा, एक अलग लोक सेवा आयोग और लेह और कारगिल में लोकसभा सीटों के लिए केंद्र सरकार के लिए संवाद कर रहे थे।
उन्होंने कहा, 'गृह मंत्रालय के साथ बातचीत के दौरान, यह समझ आया कि चुनाव से पहले समय निकाला जा रहे हैं। लोक सेवा आयोग पर केवल कुछ आश्वासन दिया गया।'
उन्होंने दावा किया, 'गृह मंत्रालय ने अनुच्छेद 371 का कोई प्रस्ताव नहीं दिया। यह एक अटकल थी। उन्होंने हमें बताया कि हमारी मौजूदा परिषदों को मजबूत किया जाएगा और वे एक सलाहकार परिषद बनाएंगे। हमारे पास पहले से ही एलएएचडीसी अधिनियम (लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद अधिनियम, 1997) है ) लेकिन अब परिषद की शक्तियां भी कम कर दी गई हैं।'
लाक्रुक ने कहा, 'लद्दाख में परंपरा है कि मतदान क्षेत्रीय आधार पर होता है। इसलिए स्वतंत्र उम्मीदवार को कुछ बढ़त मिलने की संभावना है।'
उन्होंने कहा कि एलबीए छठी अनुसूची की मांग पर लोगों को शिक्षित करने के लिए हर गांव और बस्ती में गया। केंद्र सरकार के साथ बातचीत विफल होने पर उन्हें प्रदर्शन का रास्ता अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ा।
उन्होंने कहा कि अगर लद्दाखियों की आकांक्षाएं पूरी होंगी तो देश की रक्षा मजबूत होगी। लद्दाख में युद्ध के समय नागरिक हमेशा सेना के साथ खड़े रहते हैं। इसलिए लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करना हमारे देश के लिए महत्वपूर्ण है।