कश्मीर के लोगों को 1947 में कबायली हमले के दौरान बचाने वाले उत्तरी कश्मीर के नौजवान मकबूल शेरवानी को आज भी याद किया जाता है। शेरवानी अपने कारनामों के चलते न केवल भारतीय सेना के लिए बल्कि आज आम जनता के लिए भी होरी हैं। इनमें से तो कुछ लोग ऐसे हैं कि जो खुलकर यह कहते हैं कि उनका रोल मॉडल मकबूल शेरवानी है जिसने कबायली हमले में कश्मीर और यहां के लोगों को बचाने में अपना योगदान दिया था। उनका कहना है कि अब राष्ट्रविरोधी ताकतों के लिए एक कड़ा सन्देश है कि अब हर घर से एक मकबूल शेरवानी निकलेगा। बता दें कि यह उसी कश्मीर के लोग आज खुलकर बोल रहे हैं जो कभी आतंकवादियों के जनाजों में नारे बुलंद करते थे, ‘तुम कितने बुरहान मारोगे, हर घर से बुरहान निकलेगा’।
बांदीपोरा के एक सरपंच और एक सामाजिक कार्यकर्ता राथर महराज ने बताया कि मकबूल शेरवानी एक ऐसे हीरो थे जिन्होंने कबायली हमले के दौरान दरिंदों से कश्मीरियों को बचाया था। उन्होंने कहा कि वो दरिंदे (कबायली) उस समय हमारे कश्मीर को लूटने के लिए आए थे, कश्मीरी औरतों की इज्जत पर हाथ डाला और यहां तक कि घरों से सोना, चांदी सब कुछ लूट कर ले गए। इस एक नौजवान (मकबूल शेरवानी) ने कश्मीर की आवाज उठाई और अपनी शहादत दी।
महाराज ने कहा कि आज भी हमारे दिलों में मकबूल शेरवानी जैसा जांबाज जिंदा है। अगर मैं ‘रोल मॉडल सरपंच-जेएंडके’ हूं, लेकिन मेरा रोल मॉडल मकबूल शेरवानी है। मैं उसे दिल से सलाम करता हूं। और हम हर एक घर से मकबूल शेरवानी खड़ा करेंगे जो कश्मीर की अस्मत (इज्जत) को बचाएंगे और इसे हिंदुस्तान के साथ जोड़कर रखेंगे। यह हमारा वादा है। और जो नफरत पैदा करने वाले हैं उनको भी मुंहतोड़ जवाब देंगे।
भट शाहीन ने मकबूल भट की शहादत को लेकर कहा कि हम उस नौजवान को श्रद्धांजलि देते हैं और साथ ही उनकी वीरता के लिए उन्हें सलाम करते हैं। उन्होंने कहा कि अब कश्मीर बदल रहा है, यह पाकिस्तान और उनके इशारों पर काम करने वाली हुर्रियत जैसी तंजीमों के लिए एक चेतावनी है। शाहीन ने कहा कि इस बदलते कश्मीर में अब हर घर से मकबूल शेरवानी जैसे बहादुर पैदा होंगे। उन्होंने कहा कि मकबूल शेरवानी अपने देश और कश्मीर के लिए शहीद हुए थे और हमें उनकी शहादत पर बहुत गर्व है। शाहीन ने कहा कि मकबूल भट के बहादुरी के किस्से हर स्कूल में पढ़ाए जाएं।
पाकिस्तानी हमलावरों को गुमराह किया था
मकबूल शेरवानी नेशनल कॉन्फ्रेंस के सदस्य थे, जिन्होंने अक्तूबर 1947 में उत्तरी कश्मीर के बारामुला में पाकिस्तानी पख्तून आदिवासियों और तत्कालीन जम्मू कश्मीर राज्य के विद्रोही बलों के मार्च में देरी की। इस तरह, उन्होंने भारतीय सेना के सिख रेजिमेंट के सैनिकों के लिए समय लेने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जो विलय स्वीकार किए जाने के बाद श्रीनगर में उतरे थे।
मकबूल ने आदिवासियों को कश्मीर पर आक्रमण करने की योजना बनाते देखा। श्रीनगर हवाई अड्डे के लिए सड़क पर मार्गदर्शन करने के लिए कहने पर उन्होंने उन्हें गलत रास्ता बताया। जब उन्हें पता चला कि उसने उन्हें उनके मार्च में देरी करने के लिए गुमराह किया था तो मकबूल शेरवानी को 14 गोलियां मारने से पहले उसे सूली पर चढ़ा दिया गया था। उसके शरीर को कीलों से एक लकड़ी के तख्ते पर बंद कर दिया था।
महात्मा गांधी ने दिल्ली में दी थी श्रद्धांजलि
बता दें कि बहादुर योद्धा ने 7 नवंबर, 1947 को शहादत प्राप्त की। उनकी मृत्यु के दो सप्ताह बाद, महात्मा गांधी ने उनके सर्वोच्च बलिदान का सम्मान करने के लिए दिल्ली में एक प्रार्थना सभा में उन्हें श्रद्धांजलि दी। मकबूल शेरवानी को भारतीय सेना हीरो मानती है और उनके नाम पर बारामुला में मकबूल शेरवानी हॉल भी बनाया गया है।