डल झील के पानी पर तैरने वाले बाजार की रौनक खत्म हो गई है। बाजार में सन्नाटा पसरा है। कालीन और पशमीना के कारोबार को ग्रहण लग गया है। कारोबारियों को भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है। आमदनी तो दूर पूंजी बचाने का संकट है। कारीगरों की रोजी छिन गई है। हुनरमंद हाथ बेकार हो गए हैं। हालात सुधरने की उम्मीद नहीं दिखती।
व्यापारी रोज पर्यटकों का इंतजार करते हैं, लेकिन सप्ताह बीत जाता है और बोहनी तक नहीं हो पाती। कारीगरों का पलायन शुरू हो गया है। शिकारे वाले तक रोजगार की तलाश में गोवा और दूसरे राज्यों में जाने लगे हैं। डल झील में पशमीना और कालीन की दुकान चलाने वाले गुलाम कादिर के हुनर का लोहा विदेशी पर्यटक भी मानते रहे हैं।
गुलाम कादिर अभी जर्मनी में प्रदर्शनी लगाने गए हैं। उनका भाई मुदस्सर अब दुकान संभालता है। मुदस्सर ने कंप्यूटर एप्लीकेशन में स्नातक किया, लेकिन नौकरी नहीं मिली। वह कहता है कि हमारी सुनने वाला कोई नहीं है। पुश्तैनी कारोबार को हिंसा की नजर लग गई है।
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उसे पाकिस्तान के प्रति भी गुस्सा है। मुदस्सर ने कहा कि पाकिस्तान तो खुद गया-गुजरा है, वह हमें क्या देगा। कुछ पर्यटक आते हैं और दूसरे दिन कोई घटना हो जाती है। तब कश्मीर आने वाले पर्यटकों को उनके घर से फोन आने लगता है कि वापस आ जाओ।
पशमीना कारोबार से ही जुड़े सत्तर वर्षीय गुलाम अहमद कहते हैं कि पूरा सीजन बरबाद हो गया। पिछले साल आतंकी बुरहान वानी की मौत से पहले दो महीने सीजन ठीक चला था। इस बार तो शुरू से ही माहौल खराब है। पूरे सीजन में कुछ भी कमाई नहीं हो सकी। दुकान में कम से कम तीन हजार रोजाना का खर्च है।
यह खर्च पूंजी से निकालना पड़ रहा है। कारीगर को ईद में पैसे देने होंगे। उसमें भी पूंजी ही खत्म होगी। अलगाववादियों ने जीएसटी के बारे में भी अफवाह फैला रखी है। गुलाम अहमद कहते हैं कि आमदनी जीरो है और सरकार नया टैक्स लगाना चाह रही है। नया टैक्स लगाया गया तो विरोध बढ़ेगा। संपन्न व्यापारी दिल्ली और मुंबई में प्रदर्शनी लगाने जाते हैं। छोटे कारोबारियों पर सबसे अधिक मार पड़ी है।
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शिकारा चलाने वाले उमर की शिकायत है कि घर-घर में सुरक्षा बलों के जवानों को तैनात कर दिया गया है। इससे हालात कैसे सुधरेंगे। सरकार करोड़ों खर्च कर रही है, लेकिन बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। जब तक भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा, तब तक विकास संभव नहीं है। नेता अपनी जेब भरने में लगे हैं। कश्मीर के नेता दिल्ली में कुछ और बोलते हैं और कश्मीर में कुछ और। इसलिए हालात बिगड़ रहे हैं।