लद्दाख में तैनात भारतीय सेना का जवान
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कारगिल युद्ध में महावीर चक्र से सम्मानित रिटायर्ड कर्नल सोनम वांगचुक ने चीन का सामना लद्दाख स्काउट्स से कराने की वकालत की है। उनका कहना है कि पहाड़ पर जंग में उच्च पर्वतीय इलाकों में पले-बढ़े जवानाें का कोई सानी नहीं है। पूर्वी लद्दाख में चीन की चाल को समझने से लेकर माकूल जवाब में लद्दाखी जवान सबसे बेहतर विकल्प हैं।
एलएसी के हालात में लद्दाख स्काउट्स की भूमिका पर कर्नल सोनम ने कहा कि लद्दाखी जांबाज यहां की जलवायु में शारीरिक और मानसिक रूप से ज्यादा सक्षम होते हैं। अब वक्त आ गया है जब लद्दाख स्काउट्स की और बटालियनें खड़ी कर एलएसी की निगहबानी में लगानी चाहिए।
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि गलवां घाटी की हिंसक झड़प में यदि लद्दाख स्काउट्स के सैनिक शामिल होते तो मुमकिन है, तो बहुत मुमकिन है कि शहादतें कम होतीं। लद्दाख स्काउट्स में सेवाएं दे चुके कर्नल सोनम ने कहा कि आपात स्थिति में तैनाती के दौरान मैदानी इलाकों के जवानों को जलवायु के साथ ढलने में वक्त लगता है।
इससे दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ जाती है और फौज के मनोबल पर असर डालती है। लद्दाखी सैनिकों को यहां की परिस्थितियाें के अनुसार ट्रेनिंग दी जाती है। ऐसे में एलएसी पर लद्दाख स्काउट्स से बेहतर दूसरा विकल्प नहीं है।
कई गुना ज्यादा थे पाकिस्तानी फिर भी छुड़ा ली थी पोस्ट
लद्दाख के शेर कर्नल सोनम वांगचुक ने कारगिल युद्ध में बर्फ से लकदक पहाड़ पर बैठे दुश्मन से कब्जाई गई पोस्ट को वापस हासिल किया था। उन्हें चोरबत ला पोस्ट की चुनौती मिली। 18 हजार फीट की ऊंचाई पर सीधे पहाड़ पर चढ़ाई की और फिर 135 पाकिस्तानी सैनिकों के कब्जे से पोस्ट को छुड़ा लिया। 31 मई से 1 जून 1999 के बीच असाधारण वीरता के लिए उन्हें देश का दूसरा सर्वोच्च वीरता पुरस्कार महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।