जीवन भर शांति दूत बनकर मानवाधिकारों के लिए समर्पित रहे रियासती मामलों के बेजोड़ विशेषज्ञ, पत्रकार, लेखक और समाजसेवी बलराज पुरी के निधन के साथ एक युग खत्म हो गया।
देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक हर प्रधानमंत्री ने कश्मीर मामले में बलराज पुरी से लगातार सलाह ली।
साहित्य-शिक्षा और पत्रकारिता के क्षेत्र में 68 साल की सेवा के क्रम में पुरी ने शांति, सद्भावना और संप्रदायिक सद्भाव के लिए उल्लेखनीय कार्य किया।
पंजाब जब आतंकवाद से झुलस रहा था तब भी शांति बहाली में पुरी का योगदान अहम रहा। 1980 में उन्होंने पंजाब में शांति बहाली के लिए केंद्र सरकार को महत्वपूर्ण सहयोग किया।
रियासत की नब्ज पर गहरी पकड़ रखते थे बलराज पुरी
जीवन भर शांति दूत बनकर मानवाधिकारों के लिए समर्पित रहे रियासती मामलों के बेजोड़ विशेषज्ञ, पत्रकार, लेखक और समाजसेवी बलराज पुरी का निधन एक युग के अवसान से कम नहीं है।
वर्ष 2009 में राष्ट्रीय एकता में अभूतपूर्व योगदान देने के लिए उन्हें अत्यंत प्रतिष्ठित इंदिरा गांधी सम्मान से नवाजा गया।
सोनिया गांधी के हाथों यह पुरस्कार दिए जाते समय तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पुरी द्वारा पहले जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला के बीच और बाद में इंदिरा गांधी और शेख अब्दुल्ला के बीच मतभेदों को सुलझाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका का विशेष रूप से उल्लेख किया था।
मनमोहन सिंह ने कहा था कि बलराज पुरी के कई ऐतिहासिक कामों की ओर तो अभी तक किसी का ध्यान ही नहीं गया। 86 साल के इस पुरोधा के महाप्रयाण ने उनके प्रशंसको को बेहद उदास कर दिया है।
कई अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से भी नवाजा गए
पांच अगस्त 1928 को जन्मे पुरी ने पत्रकारिता की शुरूआत सन् 1942 में महज 14 साल की छोटी सी उम्र में ही कर दी थी। सबसे पहले वे एक उर्दू साप्ताहिक से जुड़े। उसके बाद तो यह सफर कभी रुका ही नहीं। पत्रकारिता के अलावा साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका योगदान अतुलनीय था।
इसीलिए उन्हें 2005 में पद्म भूषण से अलंकृत किया गया। उन्हें कई अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से भी नवाजा गया। पुरी ने महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन में भी बड़े जोरशोर से शिरकत की।
यही वह समय था जब उन्होंने रियासत, देश और दुनिया के हालात को बहुत बारीकी से समझा और अपनी बेबाक राय से सबको प्रभावित किया।