केंद्र सरकार की पिछले 4-5 सालों से सख्ती खासकर पांच अगस्त 2019 के बाद के तेवर से कश्मीर में अलगाववाद ने घुटने टेक दिए हैं। अब संगठन के लिए नेता खोजे नहीं मिल रहे। यही वजह है कि तहरीक-ए-हुर्रियत के चेयरमैन और पाकिस्तान परस्त अलगाववादी गिलानी के करीबी मोहम्मद अशरफ सेहरई के निधन के तीन महीने बाद भी इस पद पर किसी को बैठाया नहीं जा सका।
पाकिस्तान के इशारे पर अब कोई भी अलगाववादी खेमे का दामन थामने आगे नहीं आ रहा है। 2019 में जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध ने अलगाववादी खेमे की ऑक्सीजन पाइप लाइन को भी काट दिया है। इसी महीने जमात से जुड़े ट्रस्ट और उसके पदाधिकारियों के घर एनआईए छापे के दौरान भी आपत्तिजनक सामग्री बरामद की गई। कट्टरता का बीज बो रहे जमात के स्कूल, मदरसों व उसमें पढ़ाने वाले शिक्षकों पर भी सुरक्षा एजेंसियों की नजर है।
अलगाववादियों के खिलाफ सख्ती मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में ही शुरू कर दी थी। 2017 में टेरर फंडिंग मामले में एनआईए ने घाटी में छापे मार कर एक दर्जन से अधिक अलगाववादी नेताओं को गिरफ्तार किया था। ये नेता हुर्रियत के कट्टरपंथी और नरमपंथी दोनों धड़े के थे। हालांकि, इसके बाद भी घाटी में अलगाववादी गतिविधियां चलती रहीं।
जमात के सदस्य कट्टरता का बीज बोते रहे, लेकिन पांच अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 एवं 35ए हटने पर एकाएक स्थितियां बदल गईं। हुर्रियत पर बिना प्रतिबंध ही सभी गतिविधियां ठप हो गईं। हड़ताल की कॉल बंद हो गईं। कोई अलगाववादियों के दरवाजे पर नहीं पहुंचता। इस बीच जुलाई 2020 में पीएसए के तहत उधमपुर जेल में बंद तहरीक-ए-हुर्रियत के चेयरमैन मो. अशरफ सेहरई की कोरोना से मई 2021 में मौत हो गई। तब से सेहरई की जगह कोई नहीं ले सका है।
बीते रविवार (22 अगस्त) को तो गिलानी के हैदरपोरा आवास पर लगा तहरीक-ए-हुर्रियत का बोर्ड भी उतार दिया गया। बताते हैं कि हुर्रियत पर प्रतिबंध का प्रस्ताव केंद्र को भेजे जाने के बीच किसी प्रकार की कार्रवाई से बचने के लिए यह कदम उठाया गया है। सरकार से जुड़े उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया कि अलगाववादियों पर शिकंजा कसा गया है। किसी को देशविरोधी गतिविधियों की अनुमति नहीं होगी। जमात से जुड़े लोगों की कुंडली खंगाली जा रही है।
टेरर फंडिंग में शामिल होने के सबूत
जांच एजेंसियों को हिजबुल मुजाहिदीन, दुख्तरान-ए-मिल्लत व लश्कर-ए-ताइबा की मदद से अलगाववादी नेता तथा हुर्रियत कांफ्रेंस के कैडर के टेरर फंडिंग में शामिल होने के सबूत हाथ लगे थे। देश और विदेशों से हवाला समेत अन्य अवैध चैनलों से फंड जुटाकर उसका इस्तेमाल अलगाववादी और आतंकी गतिविधियों में किए जाने, सुरक्षा बलों पर पथराव, स्कूलों को जलाने, सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने व आपराधिक षड्यंत्र के जरिये देश के खिलाफ युद्ध करने के भी सबूत मिले थे।
कई अलगाववादी हैं जेल में
एनआईए ने टेरर फंडिंग मामले में कई अलगाववादियों को गिरफ्तार कर जेल की सलाखों के पीछे डाला है। 2017 से हुर्रियत के कई नेता जेल में हैं। इनमें कट्टरवादी सैयद अली शाह गिलानी का दामाद अल्ताफ अहमद शाह उर्फ अल्ताफ फंटूश, कारोबारी जहूर अहमद वटाली, गिलानी के करीबी सहयोगी व तहरीक-ए-हुर्रियत प्रवक्ता अयाज अकबर, पीर सैफुल्लाह, हुर्रियत (एम) प्रवक्ता शाहिद-उल-इस्लाम, मेहराजुद्दीन कलवाल, नईम खान, फारूक अहमद डार उर्फ बिट्टा कराटे शामिल हैं। जेके एलएफ प्रमुख यासीन मलिक, दुख्तरान-ए-मिल्लत प्रमुख आसिया अंद्राबी, पाकिस्तान परस्त मसरत आलम भी जेल में हैं।
घाटी में हिंसा के लिए अलगाववादी ताकतों का सहारा
हिजबुल कमांडर बुरहान वानी के जुलाई 2016 में मारे जाने के बाद घाटी को हिंसा की आग में झोंकने के लिए भी अलगाववादी ताकतों का सहारा लिया गया था। एनआईए का आरोप है कि पीडीपी युवा नेता वहीद उर रहमान पारा ने पांच करोड़ रुपये गिलानी के दामाद अल्ताफ अहमद शाह उर्फ अल्ताफ फंटूश को दिए थे। फंटूश को घाटी में हिंसा और पथराव का दौर जारी रखने के लिए कहा गया था।