जम्मू। पिछले तीन दशक से भी अधिक समय तक जम्मू-कश्मीर को हिंसा की आग में झोंकने कागुनहगार अलगाववादी नेता और प्रतिबंधित संगठन जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेके एलएफ) का आतंकी यासीन मलिक संगीन आरोपों के बावजूद सरकारी सुरक्षा में खुलेआम घूमता था। यासीन मलिक पर कसा शिकंजा पहली बार अंजाम तक पहुंचा है। घाटी में शांति के लिए सरकारी प्रयासों के तहत बातचीत में भी उसे शामिल किया गया। सरकारों की ओर से उसे शांति प्रयासों के लिए बातचीत के लिए बुलाया भी जाता था। प्रशासनिक व्यवस्था में उसकी जबरदस्त दखल थी। हुर्रियत के अन्य नेताओं की तरह यासीन को भी सुरक्षा मुहैया कराई गई थी। ज्ञात हो कि टेरर फंडिंग मामले में उसे उम्र कैद की सजा सुनाई गई है।
यासीन मलिक पर 1990 के दशक में आतंकवाद के बीज बोने के आरोप हैं। कश्मीरी पंडितों के साथ ही आम नागरिकों की हत्या में भी यासीन मलिक का नाम शामिल रहा। बाद में पाकिस्तान के जेकेएलएफ से हाथ खींचने और हिजबुल मुजाहिदीन को आगे करने के बाद धीरे-धीरे यासीन मलिक अलगाववादी धड़े से जुड़ गया। केंद्र सरकार की ओर से कश्मीर समस्या के हल के लिए बुलाई गई बैठकों में भी उसे न्योता दिया गया। खुद को वह गांधी कहलाना पसंद करता था। इन सबकी आड़ में वह घाटी में हिंसा और आतंकवादियों को फंडिंग करता था। इसके लिए वह तमाम आतंकी संगठनों से फंड इकट्ठा करता था।
केंद्र सरकार की सख्ती के बाद एनआईए ने 2017 में यासीन पर हाथ डाला और पांच साल के भीतर उसे सजा तक पहुंचाया। कश्मीरी पंडितों को यासीन की सजा का लंबे समय से इंतजार था। पंडितों के अनुसार यासीन ने ही घाटी में आतंकी घटनाओं को अंजाम देने की शुरूआत की। जेकेएलएफ के आतंकियों ने निर्मम हत्याएं शुरू कीं, जिसकी वजह से पंडितों को घाटी छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। आतंकवाद के दौर से अब तक 804 पंडितों की हत्याओं के पीछे भी जेकेएलएफ का हाथ रहा है। कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति का कहना है कि टेरर फंडिंग में यासीन को सजा सुनाई गई है, लेकिन उन मुकदमों को भी खोला जाना चाहिए जिसमें जेकेएलएफ आतंकियों ने कश्मीरी पंडितों की हत्या की। वह न केवल कश्मीरी पंडितों का गुनहगार है बल्कि घाटी के उन नौजवानों और परिवारों का भी कसूरवार है जिनके हाथों में बंदूक और पत्थर थमाए गए। उसके लिए उम्र कैद की सजा पर्याप्त नहीं है। कश्मीरी पंडितों की हत्याओं से जुड़े मामले भी खोले जाने चाहिए ताकि उन्हें न्याय मिल सके।
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अन्य अलगाववादियों को भी सजा का खुला रास्ता
यासीन मलिक को सजा से घाटी में हिंसा और टेरर फंडिंग के आरोप में गिरफ्तार किए गए मसर्रत आलम, दुख्तरान-ए-मिल्लत की आसिया अंद्राबी, शब्बीर शाह, अल्ताफ फंटूश समेत अन्य अलगाववादियों को सजा दिलाने का रास्ता भी खुल गया है। कानून के जानकारों का कहना है कि यासीन मलिक का टेरर फंडिंग का कानूनी आधार अन्य मुकदमों में भी आधार बन सकता है। हालांकि, अन्य अलगाववादियों के मामले अलग-अलग हैं।
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सभी मामलों पर जल्द से जल्द हो ट्रायल: वैद
लंबे समय तक आतंकवाद से लड़ने वाले जम्मू-कश्मीर के पूर्व डीजीपी डॉ. एसपी वैद कहते हैं कि 1990 में कश्मीरियों के नरसंहार का यासीन ही जिम्मेदार था। वह ही जेकेएलएफ का प्रमुख था। शुरूआत में जेकेएलएफ ही था, अन्य आतंकी संगठन बाद में आए। उसके खिलाफ अन्य मामले भी हैं जिन पर जल्द से जल्द ट्रायल होना चाहिए और उसमें सजा सुनाई जानी चाहिए। उसने हाफिज सईद, सलाहुद्दीन के साथ ही अन्य आतंकी संगठनों से पैसे लेकर घाटी को हिंसा की आग में झोंका। युवा पीढ़ी को बर्बाद किया। ऐसे सभी तत्वों और देश विरोधी इस पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
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टेरर फंडिंग के अलावा भी यासीन पर कई संगीन आरोप
जेकेएलएफ प्रमुख यासीन मलिक पर टेरर फंडिंग के अलावा और भी कई संगीन आरोप हैं। इनमें वायुसेना के अधिकारियों की हत्या समेत तत्कालीन गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबिया सईद के अपहरण और रिहाई के बदले में पांच दुर्दांत आतंकियों को छोड़े जाने का भी आरोप है।
जानकार बताते हैं कि नब्बे के दशक में जेकेएलएफ की वजह से ही कश्मीरी पंडितों को विस्थापन के लिए मजबूर होना पड़ा। सबसे पहले 1989 में आतंकियों ने भाजपा नेता टीका लाल टपलू की हत्या की गई। इस घटना के लगभग डेढ़ महीने बाद सेवानिवृत्त जज नीलकंठ गंजू की हरि सिंह स्ट्रीट में चार नवंबर 1989 को आतंकियों ने हत्या कर दी। यह हत्या आतंकी मकबूल भट को फांसी की सजा सुनाए जाने के बदले में की गई, क्योंकि गंजू ने ही उसे एक इंस्पेक्टर की हत्या मामले में सजा सुनाई थी। इसमें यासीन मलिक और जावेद मीर नलका के शामिल होने की बात भी सामने आई, लेकिन प्राथमिकी में अज्ञात आतंकियों का जिक्र है। आठ दिसंबर 1989 को गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबिया सईद का यासीन मलिक व अन्य आतंकियों ने अपहरण कर लिया था। बदले में विभिन्न जेलों में बंद पांच खूंखार आतंकियों को छोड़ना पड़ा था। इसमें नलका भी था। इस घटना के लगभग डेढ़ माह बाद 25 जनवरी 1990 को यासीन मलिक व जेकेएलएफ के अन्य आतंकियों ने श्रीनगर में वायुसेना के जवानों पर अंधाधुंध फायरिंग की। इसमें चार की मौत हो गई, जबकि 40 अन्य घायल हो गए। इन दोनों मामलों में टाडा कोर्ट में कार्यवाही चल रही है।