जाहिर है कि 12 प्रतिशत ब्याज लगाया गया है और इसे प्राप्त किया गया है। यह ऋण सुविधा भूमि के ट्रस्टियों, मालिकों द्वारा प्रदान की जा रही है। यहां तक कि वित्तीय संस्थान भी कामर्शियल लोन पर मुश्किल से 12 फीसदी ब्याज लेते हैं। अगर स्कूल को कोई वित्तीय सहायता प्राप्त करने की आवश्यकता होती है, तो वित्तीय संस्थान अनुसूचित बैंक इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए अल्प ब्याज पर प्रदान करेंगे कि शैक्षणिक संस्थान के संचालन के लिए वित्तीय सहायता की आवश्यकता थी, जो शिक्षा प्रदान करता है, अन्यथा एक धर्मार्थ कार्य।
स्कूल को आड़े हाथ लेते हुए समिति ने कहा कि ट्रस्ट के सदस्यों द्वारा किराया वसूल किया जा रहा है, जोकि जमीन के जमींदार हैं। एफएफआरसी ने कहाए कि इसके अलावा 11 कारों को स्कूल के निपटान में रखा गया है, यह निर्दिष्ट किए बिना कि वे किसके निपटान में हैं और 11 कारों को शैक्षणिक संस्थान में रखने की क्या आवश्यकता है। इनकी मरम्मत और रखरखाव पर 3.2 करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च की गई है।
18 लाख रुपये से अधिक की राशि छात्रावास और भोजन के खर्च के रूप में भुगतान किया गया है, जब स्कूल एक गैर बोर्डिंग स्कूल है और विज्ञापनों, यात्रा और कारों के चलने पर भारी खर्च किया गया है। समिति ने कहा कि एक स्वतंत्र प्राधिकरण द्वारा स्कूूल के वित्त की जांच करवाना तत्काल जरूरी है। यह भी कहा कि इस मामले में जो तथ्य रिकॉर्ड से सामने आए हैं, वे डीपीएस स्कूल अठवाजन, श्रीनगर के वित्तीय मामलों की गहन जांच की मांग करते हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि शिक्षा का कोई व्यवसायीकरण नहीं हो। समिति ने कहा कि जांच अधिकारी अपनी नियुक्ति की तारीख से दो महीने के भीतर एफएफआरसी को अपनी रिपोर्ट सौंपेगा।