निजी भूमि का अधिग्रहण करने के बावजूद चार दशक तक प्रभावित परिवारों को पूरा मुआवजा न देने पर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार पर दस लाख का जुर्माना लगाया है। मुख्य न्यायाधीश पंकज मित्थल और न्यायाधीश संजय धर की खंडपीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा - बिना पूरा मुआवजा दिए भूमि अधिग्रहण और कब्जे के दशकों बाद भी मामला लंबित रखना चिंताजनक स्थिति है। कोर्ट ने सरकार को तीन माह में मुआवजा वितरण प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश देते हुए मुख्य सचिव से कहा है कि वे जवाबदेह अफसरों पर कड़ी कार्रवाई करें।
याचिका के मुताबिक बारामुला के सांगरी में हाउसिंग कालोनी स्थापित करने के लिए आवास एवं शहरी विकास विभाग ने वर्ष 1978 में 220 कनाल भूमि के अधिग्रहण की अधिसूचना जारी की। बाद में 1990 में 220 के बजाय 150 कनाल की एक और अधिसूचना जारी की गई।
सरकार ने भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया के तहत जमीन ले ली, लेकिन प्रारंभिक भुगतान के बाद उन्हें निर्धारित नियमों के तहत मुआवजा नहीं दिया गया। याचिका में मांग की गई कि ऐसी परिस्थितियों में नए सिरे से अधिग्रहण की प्रक्रिया चलाई जानी चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि यह दशकों तक भूमि मालिकों को उनके मौलिक अधिकार से वंचित रखने की स्थिति चिंताजनक है। इतने लंबे समय तक प्रभावितों को उनके मौलिक अधिकार से वंचित रखने पर सरकार पर दस लाख का जुर्माना लगाया जाता है।
हालांकि कोर्ट ने कहा कि अधिग्रहण हो चुका है और जमीन का दशकों से जमीनी स्तर पर हस्तांतरण हो चुका है। ऐसे में अधिग्रहण की प्रक्रिया को खारिज करने का आदेश नहीं दिया जा सकता। जेएनएफ/संवाद
तीन माह में ब्याज सहित करें भुगतान
कोर्ट ने कहा कि मुख्य सचिव सभी विभागों के मुखिया हैं। इस मामले में उनसे अपेक्षा की जाती है कि वह इस लापरवाही और अत्यधिक लेटलतीफी के लिए जिम्मेदार अफसरों पर कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित करें। साथ ही सरकार तीन माह के भीतर मुआवजा वितरित करे। इसमें ब्याज सहित सभी लाभ देने होंगे।