अपवाद के तौर पर 1962 और 1987 के विधानसभा चुनाव को छोड़ दें तो चिनाब घाटी, कश्मीर घाटी, पीर पंजाल और तवी के मैदानी भागों की अपनी-अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते यहां कोई भी पार्टी अकेले कभी बहुमत के आंकड़े तक पहुंचती नजर नहीं आई है। जम्मू की जमीन से इस बार डोगरा सीएम का नारा तो गूंजा, लेकिन भाजपा को पूर्ण बहुमत की तरफ नहीं ले जा पाया। भाजपा ने पीर पंजाल की आठ, चिनाब घाटी की आठ सहित घाटी में 19 सीटों पर चुनाव लड़ा। पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष रविंद्र रैना समेत तमाम बड़े नेता भी चिनाब, झेलम और कश्मीर घाटी के लोगों की तासीर नहीं भांप पाए। दावा था कि पार्टी 50 प्लस सीटें लेगी, फिर पर्दे के पीछे से 35 सीटें जीतने का आत्मविश्वास दिखाया गया, लेकिन ऐसा भी नहीं हो पाया। जम्मू संभाग की 40 सीटों पर जरूर भाजपा को सफलता मिलती नजर आई।
भाजपा ने जम्मू जिले की 11 में 10 सीटों पर बढ़त बनाई। कांग्रेस ने जितने जोर से प्रचार किया। राहुल, खरगे और प्रियंका की रैलियां करवाईं उस अनुरूप नतीजे नहीं मिले। पार्टी 6 सीटों तक सिमट गई। पिछले चुनाव में 86 सीटों पर लड़ी कांग्रेस को 18.36 फीसदी वोट शेयर के साथ 12 सीट मिली थीं। नेशनल कॉन्फ्रेंस को 15 सीट मिली थीं। पीडीपी ने 28 सीट तो भाजपा ने 25 सीट जीतने के बाद विपरीत विचारधारा होते हुए मिलकर सरकार बनाई थी।