बाढ़ ग्रस्त कश्मीर से मजदूरों के पलायन कर जाने से घाटी में पुनर्निर्माण का काम अगले छह महीनों तक लटक सकता है। प्राकृतिक आपदा से घाटी में सरकारी एवं गैर सरकारी बुनियादी ढांचे को काफी नुकसान हुआ है।
मजदूरों के अभाव में श्रीनगर शहर को साफ करने के काम में भी उम्मीद से ज्यादा समय लग सकता है। घाटी में बिहार राज्य के मजदूर रहते थे (भले ही वे किसी भी शहर के हों, इन्हें इसी नाम से पुकारा जाता है)।
बाढ़ का पानी बढ़ने के बाद कुछ वायु सेना के बचाव कार्य के दौरान घाटी छोड़ गए, बाकी राष्ट्रीय राजमार्ग खुलते ही घाटी छोड़ गए।
नहीं मिल रहे बिहार के मजदूर
अपने घर की मरम्मत करवाने के लिए मजदूर तलाश रहे बशीर अहमद डार ने कहा, इन दिनों मजदूर नहीं मिल रहे हैं। बाढ़ से पहले मजदूर लोग रामबाग, चन्नपोरा, हैदरपोरा, हावल और हरी सिंह स्ट्रीट जैसे प्रतिष्ठित स्थानों पर जमा हो जाते थे, ताकि जिन्हें इनकी सेवाओं की आवश्यकता है, वे इन्हें यहां से अपने साथ ले जा सकें, लेकिन आज इन जगहों का दृश्य पूरी तरह से भिन्न है।
तनवीर अहमद भट्ट के अनुसार, मैं मजदूरों की तलाश में रामबाग, हैदरपोरा और नाटीपोरा गया लेकिन मुझे वहां पर कोई नहीं मिला। जहां एक तरफ बाढ़ के कारण बागबानी की फसलें तबाह हो चुकी हैं, वहीं बुनियादी ढांचों के विकास से जुडे़ लोगों को अब इस बात की चिंता सता रही है कि कहीं विस्थापित मजदूरों के चले जाने से शुरू की हुई परियोजनाएं अधर में न लटक जाएं।
घाटी में बाढ़ के बाद बर्बादी का मंजर
घाटी में हालात धीरे-धीरे सुधरने लगे हैं। रविवार को लाल चौक और आसपास के इलाकों में बाढ़ का पानी थोड़ा कम हुआ। बाढ़ से लाल चौक में स्थित ज्यादातर दुकानों का सामान बर्बाद हो गया है। शोरूम और दुकानों में पड़े ब्रांडेड कपड़े, बिजली उपकरण, घड़ी और हस्तशिल्प सामान का नुकसान हो गया है।
व्यापारी अब दुकानों की साफ-सफाई करने में जुटे हुए हैं। रेजीडेंसी रोड के लंबेरट लेन में स्थित मार्केट में व्यापार करने वाले निसार अहमद वानी ने बताया कि बाढ़ से दुकानों में रखा सामान खराब हो गया है। वहीं अब बदबू ने परेशान करना शुरू कर दिया है।
उन्होंने बताया कि वह और उनके साथी दुकानदार शोरूम और दुकानों में साफ-सफाई करने में लगे हैं। वानी के अनुसार बाढ़ से उनका काफी नुकसान हुआ है। हालांकि वह अल्लाह का शुक्रिया अदा करते हैं कि कम से कम वह और उनका परिवार सलामत हैं।