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सेना को पाक आतंकियों से सीमा की सुरक्षा का चैलेंज

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बार्डर और नियंत्रण रेखा पर बाढ़ से हुई तबाही के बाद अब सुरक्षा ढ़ांचे को फिर से खड़ा करना सेना और बीएसएफ के लिए बड़ी चुनौती है। सेना और बीएसएफ लगभग एक पखवारे तक राहत और बचाव कार्य में जुटी रही।
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अब आपरेशन मेघराहत के समाप्त होने के बाद ध्वस्त तारबंदी को फिर से लगाने और अग्रिम चौकियों की व्यवस्था चाक चौबंद करने का कार्य को युद्धस्तर पर शुरू किया गया है।

बाढ़ से लगभग पचास से साठ किलोमीटर तक तारबंदी को भारी नुकसान हुआ है। घुसपैठ और तस्करी रोकने के लिए बनाई गई तारबंदी कई स्थानों पर पूरी तरह बह गई है। नुकसान कई स्थानों पर कुछ-कुछ दूरी तक हुई है।
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चौकियों को भारी नुकसान, वाच टावर गिरे

सेना के सूत्रों के मुताबिक एलओसी और बार्डर पर कई स्थानों पर तारबंदी का नामो निशान तक नहीं बचा है। इस खाली स्थान के फायदा आंतकी उठा सकते हैं। लिहाजा निर्माण और मरम्मत कार्य में तेजी लाई गई है।

बाढ़ एक दर्जन से अधिक अग्रिम चौकियों को भी भारी नुकसान पहुंचाया। वाच टावर गिर गए। उपकरणों को भी नुकसान पहुंचा। अग्रिम चौकियों पर सुरक्षा ढ़ांचा खड़ा करना सेना और बीएसएफ की प्राथमिकता है।

जम्मू संभाग में अखनूर के मालूचक से फठानकोट तक लगभग 190 किलोमीटर तक अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बीएसएफ का पहरा है। बीएसएफ की ओर से बार्डर की तारबंदी का मुआयना पूरा कर लिया गया है।
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LOC सुरक्षा बहाली में लगेगा समय

बीएसएफ सूत्रों के मुताबिक आंतरराष्ट्रीय सीमा पर कई टुकड़ों में अलग-अलग स्थानों पर लगभग बीस से पच्चीस किलोमीटर तक तारबंदी को नुकसान पहुंचा है। कहीं नुकसान ज्यादा है और कहीं थोड़ी मरम्मत से सुरक्षा पुख्ता किया जाना संभव हो जाएगा।

भारत-पाक नियंत्रण रेखा पर सुरक्षा ढ़ांचे को अधिक नुकसान हुआ है। तारबंदी तीस से पैंतीस किलोमीटर तक क्षतिग्रस्त हुई है। एलओसी का क्षेत्र बड़ा है। इसलिए नुकसान के आकलन में ज्यादा वक्त लगा है। लगभग 734 किलोमीटर लंबे एलओसी पर फिर से सुरक्षा तंत्र को पूर्ववत बहाल करने में अधिक समय लग सकता है।

पिछले साल बारिश में सांबा में तारबंदी को नुकसान पहुंचा था लेकिन दायरा कम था। इस बार की बाढ में श्रीनगर में सेना के हथियार और गोला-बारूद को भी नुकसान पहुंचा है। कुछ हथियार बह गए। सेना इस नुकसान का भी आकलन कर रही है।
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