सीमा पार दुश्मनों से मुकाबले के लिए जम्मू-कश्मीर की नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर तैनात भारतीय सेना पहले से और ज्यादा मजबूत हो गई है। एलओसी पर तैनात सैनिकों को फिनलैंड से मंगाई गईं अत्याधुनिक राइफलें दी गईं हैं। सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अत्याधुनिक स्नाइपर राइफल्स को सेना में शामिल किया गया है। वे अब इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। ये साको .338 टीआरजी-42 स्नाइपर राइफलें हैं।
सेना के अधिकारी ने कहा, साको .338 टीआरजी-42 स्नाइपर राइफल की मारक क्षमता, रेंज और टेलीस्कोपिक साइट भी बेहतर है। उन्होंने कहा कि यह कदम नियंत्रण रेखा पर परिचालन की गतिशीलता में बदलाव के बीच स्नाइपर को और अधिक घातक बनाने के लिए है। साथ ही कहा कि जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा (आईबी) के साथ आगे के इलाकों में गश्त कर रहे सैनिकों के लिए यह एक बड़ी चुनौती रही है। नियंत्रण रेखा पर वर्ष 2018-19 में अचानक बढ़ी घटनाओं ने सशस्त्र बलों को बेहतर स्नाइपर राइफलों को शामिल करने और इस तरह के हमलों के खिलाफ अपने स्नाइपर को प्रशिक्षित करने के लिए प्रेरित किया।
सेना में 10 स्नाइपर की टीम को मंजूरी
एक अधिकारी ने कहा कि दुनियाभर में इसे सबसे सटीक और विश्वसनीय हथियार माना जाता है। सेना ने यूनिटों और रेजिमेंटल सेंटरों से 10 स्नाइपर की टीम को अनुमति दी है। साको राइफल्स ने बेरेटा द्वारा .338 लापुआ मैग्नम स्कॉर्पियो टीजीटी और बैरेट द्वारा .50 कैलिबर एम95 की जगह ले ली है, जिन्हें 2019 और 2020 में भारतीय सेना में शामिल किया गया था। इटली और अमेरिका में बनी इन राइफलों ने पुराने रूसी ड्रेगुनोव की जगह ली थी। 1990 के दशक में पहली बार खरीदे गए ड्रैगुनोव धीरे-धीरे समकालीन स्नाइपर राइफल्स से पीछे हो गए हैं जो बेहतर जगह और माउंट, ज्यादा सटीक और 1 किलोमीटर से अधिक की स्ट्राइक रेंज प्रदान करते हैं।