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Jammu News: सोजनी शिल्प बचाने की जंग में दिव्यांग तारिक ने खड़ा किया 250 कारीगरों का समूह

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बडगाम में सोजनी शॉल काढ़ते तारिक अहमद और उनके साथी। संवाद
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अमृत पाल सिंह बाली
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कश्मीर की विश्वविख्यात सोजनी कढ़ाई आज अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। बाजार के बदलते रुझानों और युवाओं के इससे दूर होने के बीच शिल्पकार तारिक अहमद (42) इसे बचाने की मुहिम में जुटे हैं। 90 फीसदी तक दिव्यांग तारिक मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (दुर्लभ स्नायविक विकार) से पीड़ित हैं। उन्होंने दिव्यांगता को पीछे छोड़कर स्पेशल हैंड्स ऑफ कश्मीर नाम से एक स्वयं सहायता समूह बनाया है। इससे 250 से अधिक कारीगर जुड़े हैं जिनमें 45 से अधिक दिव्यांग हैं।
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बडगाम के गोटापोरा निवासी तारिक ने बताया, हमारी कला मिट रही है। करीब 85 फीसदी युवा कारीगर सोजनी शिल्प छोड़कर अन्य व्यवसायों में जा रहे हैं। इसका मुख्य कारण महज 200-250 रुपये दिहाड़ी है। इस कला को बचाने के लिए सरकारी सहयोग जरूरी है। यह केवल प्रदर्शनियों या कार्यक्रमों तक ही सीमित न रहे। हालांकि सोजनी को जीआई टैग मिलने से कुछ सुधार हुआ है। असली उत्पादों को पहचान मिलने से मशीनी नकल से बाजार सुरक्षित हुआ और दाम सुधरे हैं। तारिक को 2019 में राज्य पुरस्कार, 2021 में यंग लीडरशिप अवाॅर्ड, हेलेन केलर अवाॅर्ड, मार्तंड सिंह अवाॅर्ड (इंटैक) और फेयर ट्रेड अवाॅर्ड सहित कई राष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं।
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तारिक का सुझाव
सोजनी कढ़ाई की प्रसिद्धि के लिए हमें नए डिजाइन और बाजार चाहिए। इस कला को आधुनिक जमाने में पहचान दिलानी होगी।


क्या है सोजनी कढ़ाई
- कश्मीरी शॉल पर हाथ से की जाने वाली जटिल कढ़ाई।

- पश्मीना/ऊन पर पतले धागों से बनाए जाते हैं प्रकृति प्रेरित डिजाइन

- दोरुखा तकनीक : कपड़े के दोनों ओर एक समान कढ़ाई

- एक शॉल बनाने में एक माह से दो वर्ष तक समय लगता है

- मूल्य 10,000 से 5 लाख तक (श्रम की अत्यधिक लागत के कारण)।





सोजनी का ऐतिहासिक सफर

- उत्पत्ति: मुगल काल (विशेषकर अकबर के शासन में)।

-ईरानी कारीगरों द्वारा कश्मीर में लाई गई तकनीकें।

- प्रकृति से प्रेरित डिज़ाइनों को मुगल दरबार का संरक्षण मिला।

-सदियों से कश्मीर की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा।


हैंडलूम डे पर अपील

- तारिक अहमद ने अपील की है कि स्थानीय कारीगरों के हस्तनिर्मित उत्पाद ख़रीदें। देश की कला और परंपराओं को बचाने में योगदान दें।


प्रमुख चुनौतियां :
- युवा रुझान में गिरावट : 85 फीसदी युवा कारीगरों ने पेशा छोड़ा।

- अपर्याप्त मजदूरी : मात्र 200-250 रुपये दिहाड़ी

- सीमित सरकारी समर्थन : केवल प्रदर्शनियों तक सहयोग।

बडगाम में सोजनी शॉल काढ़ते तारिक अहमद और उनके साथी। संवाद

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