कश्मीरी कैलेंडर के अनुसार शिव परिवार की स्थापना की जाती है। पूर्व में स्थापित किए जाने वाले इन मंदिरों को ठोकुर कुठ कहा जाता था। यहीं पर भगवान शिव के परिवार को स्थापित किया जाता है। कलश और गागर में अखरोट भरे जाते हैं। वहीं पूजन में अखरोट के प्रयोग के पीछे भी एक धार्मिक मान्यता है।
कहा जाता है कि अखरोट को चारों वेदों का प्रतीक माना जाता है। वहीं सोनिपतुल जिसे भगवान शिव का प्रतीक माना जाता है, इसकी पूजा की जाती है। इसके साथ ही पंच तत्व (पंचाम्रत) स्नान के बाद महिमनापार के साथ फूल, बेलपत्र, धतूरा का अभिषेक किया जाता है। वहीं पूजन विधि पूरी होने के बाद कश्मीरी पंडित एक दूसरे को हेरथ की शुभकामनाएं देकर शिवरात्रि पर्व को पूरा करते हैं।