तमाम उठापटक और बीते दो दिनों से चल रहे सियासी बवंडर के बीच शुक्रवार को अंतत: रियासत में राज्यपाल शासन लागू हो गया।
राज्यपाल ने राज्य में राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति बताते हुए वीरवार को केंद्र से राज्यपाल शासन लागू करने संबंधी सिफारिश की थी।
राज्यपाल की रिपोर्ट और केंद्र की संस्तुतियों के आधार पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने राज्यपाल शासन लागू करने संबंधी सिफारिश को मंजूरी दे दी। इससे पहले 1977 से अब तक रियासत में पांच बार राज्यपाल शासन लगा है।
हालांकि, राजभवन ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल उमर के कार्यकारी मुख्यमंत्री पद का दायित्व संभालने से इनकार संबंधी कोई पत्र नहीं मिला है।
अस्वस्थ पिता का कुशलक्षेम पूछकर बुधवार को उमर अब्दुल्ला के दिल्ली पहुंचते ही राजनीतिक सरगर्मी काफी तेज हो गई थी।
उमर ने दिल्ली में राज्यपाल एनएन वोहरा से मुलाकात कर कार्यकारी मुख्यमंत्री पद के दायित्व से मुक्त करने का आग्रह किया था।
दलों के बीच चलती रही सत्ता की सौदेबाजी
इसके साथ ही परिणाम घोषणा के एक पखवाड़े बाद भी किसी भी दल ने सरकार बनाने की दिशा में सकारात्मक कदम नहीं उठाए। पीडीपी-भाजपा और भाजपा-नेकां के बीच केवल सत्ता के लिए सौदेबाजी ही चलती रही।
इस बीच, राज्यपाल ने केंद्रीय गृह सचिव और राष्ट्रपति से मिलकर राज्य के वर्तमान हालात और राजनीतिक अस्थिरता की तस्वीर पेश की। साथ ही राज्य में राज्यपाल शासन लागू करने संबंधी रिपोर्ट केंद्र को सौंप दी।
केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने वीरवार को ही यह रिपोर्ट पीएमओ को भेज दी, ताकि इस पर फैसला लिया जा सके। इसके बाद ही यह कयासबाजी शुरू हो गई थी कि रियासत में एक-दो दिनों में राज्यपाल शासन लगना तय है।
अंतत: राष्ट्रपति ने केंद्र की संस्तुतियों को मंजूरी दे दी। इस प्रकार बीते 15 दिन से सत्ता संघर्ष के लिए चल रहे नाटक का पटाक्षेप राज्यपाल शासन के रूप में हुआ। राज्यपाल शासन लागू होने के बाद राजनीतिक दलों में मायूसी है।
सभी पार्टियां एक-दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप करने में जुटी हुईं हैं। हालांकि, सभी दलों को विश्वास है कि जल्द ही सियासी धुंध छंटेगी और राज्य में विकास के लिए संकल्पित सरकार अस्तित्व में आएगी।
19 जनवरी तक था कार्यकाल
वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल 19 जनवरी तक था, लेकिन त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में सरकार गठन की तस्वीर एक पखवाड़े बाद भी साफ नहीं हो पाई।
काफी हद तक पीडीपी और भाजपा के बीच बात बनी थी, लेकिन दोनों दलों के बीच औपचारिक बातचीत नहीं शुरू हो पाई थी। इसके पहले सरकार बनाने की दिशा में भाजपा नेताओं की नेकां से भी बातचीत हुई थी।
जम्मू कश्मीर में गवर्नर रूल
कब से कब तक
26 मार्च 1977 09 जुलाई 1977
06 मार्च 1986 07 नवंबर 1986
19 जनवरी 1990 09 अक्तूबर 1996
18 अक्तूबर 2002 02 नवंबर 2002
11 जुलाई 2008 05 जनवरी 2009
राज्यपाल शासन पर ये प्रतिक्रियाएं आईं
रियासत में राज्यपाल शासन के लिए पीडीपी संरक्षक मुफ्ती मोहम्मद सईद जिम्मेदार हैं। छह साल तक मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के लिए वे राज्य को अंधकार में धकेलने का मुझ पर अनायास आरोप मढ़ रहे हैं। सरकार बनाने के लिए पर्याप्त समय था, लेकिन इस दिशा में ठोस पहल नहीं की गई। - उमर अब्दुल्ला, कार्यकारी अध्यक्ष, नेकां
कांग्रेस ने नतीजे घोषित होते ही त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में पीडीपी को बिना शर्त समर्थन का ऐलान कर दिया था। पीडीपी के 28 और कांग्रेस के 12 विधायकों के साथ चार से पांच विधायक भी समर्थन को तैयार थे। स्थायी सरकार बन जाती। बदकिस्मती से मुफ्ती मोहम्मद सईद ने भाजपा के साथ बात करना बेहतर समझा। नतीजा सामने हैं। - प्रो. सैफुद्दीन सोज, प्रदेश अध्यक्ष, कांग्रेस
कार्यवाहक मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के पद से हटने से रियासत में संवैधानिक संकट की स्थिति में राज्यपाल शासन के अलावा कोई विकल्प नहीं था। भाजपा चाहती है कि जम्मू कश्मीर में छह साल तक चलने वाली स्थायी लोकतांत्रिक सरकार बने। कोर ग्रुप की बैठक में इस पर विचार होगा। सरकार गठन के लिए भाजपा के पास विकल्प खुले हैं। - जुगल किशोर शर्मा, प्रदेश अध्यक्ष, भाजपा
उमर ने बचकाना हरकत की है। राज्यपाल शासन अस्थायी तौर पर लागू हुआ है। यह स्थायी व्यवस्था नहीं है। पीडीपी सरकार गठन की दिशा में अपने प्रयास जारी रखेगी। उम्मीद है कि जल्द ही जम्मू कश्मीर में लोकतांत्रिक सरकार अस्तित्व में आएगी। पार्टी ने विकासोन्मुख स्थायी सरकार के लिए लगातार प्रयास जारी रखा है। नतीजे जल्द सामने होंगे। - नईम अख्तर, मुख्य प्रवक्ता, पीडीपी