उम्र पचास वर्ष, चेहरे पर चिंता की रेखाएं, आंखों में आंसू और दिमाग में भविष्य की चिंता। इस बार आई बाढ़ में पचास वर्षीय महिला रतना की झोपड़ी बह गई।
लोगों के घरों में झाडू बर्तन का काम कर परिवार का पालन पोषण करने वाली रतना और उसके परिवार को भगवती नगर स्थित यात्री निवास में दो वक्त की रोटी तो मिल रही है, लेकिन उन्हें भविष्य की चिंता सता रही है।
यह कहानी सिर्फ रतना की ही नहीं है, यात्री निवास में रहने वाले सभी 19 परिवारों की है। कुल मिलाकर यहां पर 160 लोग हैं। हर किसी की दास्तां दर्द भरी है। एक से बात करो तो दूसरा अपनी कहानी सुनाने के लिए आतुर हो जाता है।
सबको यहां रहने के लिए जगह, कंबल, खाना-पीना मिल रहा है, लेकिन सबके दिल में घर की छत छिनने का दर्द है। पेशे से मजदूर ये लोग तवी के किनारे झोपड़ियां बनाकर रहते थे। बाढ़ में झोपड़ियों के बह जाने के बाद इन्हें भगवती नगर के यात्री निवास में ढहराया गया है।