दुरूह युद्ध स्थल की परिस्थितियां कई मायनों में चुनौतीपूर्ण थीं। कारगिल से लेकर बटालिक और मश्कोह तक के इलाके का भूगोल इंसानी आवाजाही के लिए भी मुश्किल था।
ऐसे में युद्ध सामग्री को पहुंचाने और खराब होने वाली मशीनरी को दुरुस्त करने की जटिलताएं सामने थीं। इस सबके बावजूद भारतीय सेना के इलेक्ट्रानिक्स एंड मेकेनिकल इंजीनियर्स ने हथियारों और उपकरणाें के इस्तेमाल में रुकावट नहीं आने दी।
विज्ञापन
कारगिल युद्ध के मोर्चे पर दिन-रात जुटे इंजीनियर्स ने भीषण गोलाबारी के बीच अग्रिम पोस्टों पर जाकर अपना मोर्चा संभाले रखा। हथियारों, मशीनों और उपकरणों में खराबी आती तो उसे झट से बदल दिया जाता।
चोटियों से बम बरसाते दुशमन के सामने यांत्रिक रुकावट घातक साबित हो सकती थी, मगर इंजीनियर्स ने फंसने वाले वाहनों, रुकने वाली मशीनों और जाम हुए हथियारों को ठीक करने में देरी नहीं होने दी।
कई दफा हेलीकाप्टर के माध्यम से मशीनों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाया गया। यांत्रिक अड़चनों को दूर करने में दिखाई गई गजब की फुर्ती दुश्मन पर जोरदार जवाबी हमले का सबब बनी।