जम्मू जिले का अंतिम गांव गिगड़ियाल खुद की भौगोलिक स्थिति की वजह से खास है। पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) की सीमा से करीब तीन किमी दूर यह गांव एक समय खुद को अनजान खतरे के रूप में पाता रहा है। यहां कभी भी पाकिस्तान के दहशतगर्दों की तरफ से गोलीबारी कर दी जाती और लोग खौफ में जीते। 2017 से यहां गोलीबारी बंद है। अब लोगों को खुद की जमीन पर लहलहाती फसलें देखने का इंतजार है।
चुनावी माहौल के बीच गांव के सरपंच शाम लाल से मुलाकात हुई तो उन्होंने बताया कि जम्मू से करीब 70 किमी दूर हमारा गांव अब भी जिम्मेदार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की पहुंच से बाहर है। नजदीक की खौड़ तहसील तक तो वह आते हैं लेकिन यहां आना भूल जाते हैं। दस साल में कोई एक-दो बार अधिकारी यहां आए। हमसे शिकायत भी ली। इसके बाद उस पर काम कभी नहीं हुआ। ऐसा लगता है कि जैसे चिनाब के ऊपर से गुजरते समय पुल से हमारी चिट्ठी को नदी में बहा दिया जाता है। यह केवल जुमला नहीं, अब गांव के लोगों के बीच मजाक बन गया है। ऐसा मजाक जिसके जरिए वे अपने दर्द को हल्का कर लेते हैं।
शाम लाल ने बताया कि 1947 में देश के साथ हमको भी आजादी नहीं मिली। 1965, 1971 और 1999 में सीमा पार से शुरू हुए युद्ध की वजह से हमको यहां से विस्थापित होना पड़ा। दो से तीन साल गांव में वापस आने में लग गए। 1999 में तो पांच साल घर से बेघर रहे। जम्हूरियत में बैठे लोगों को समझना चाहिए कि केवल घर ही नहीं होते जिनको हमें दोबारा से ठीक करना होता है। अपने खेतों को भी फसलों के लिए तैयार करना होता है।
विस्थापन की वजह से हमारी करीब 1500 एकड़ जमीन दो दशक में जंगल बन गई। इस जमीन को खेती के योग्य बनाने में करीब 25 हजार रुपये प्रति एकड़ खर्च आएगा। गांव में कोई घर इतना सक्षम नहीं है कि इस खर्च को उठा पाए। सरकार को ही इसके लिए मदद करनी होगी। खेतों में बिछी बारूदी सुंरगें हटानी होंगी। सेना या सरकार के प्रतिनिधि ही इनको हटा सकते हैं। सुबह सात बजे से शाम चार बजे तक ही खेतों में काम करने की अनुमति अभी है। इसे भी सेना के अधिकारियों को बढ़ाना चाहिए।
देश की रक्षा में बलिदान हुए गांव के जवान
गांव के ही जगदीश राज ने बताया कि गिगडियाल से देश की रक्षा के लिए जवान भी निकलते हैं। करीब 30 युवा अभी सेना में सेवा दे रहे हैं। अलग-अलग लड़ाई में चार युवा बलिदान भी हुए। इनमें आईटीबीपी के जगदीश कलसी, सेना में रहे सेवा राम, पैरा फोर्स में रहे बलदेव राज और जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स के किशन लाल शामिल हैं।
1965 की लड़ाई में सीमा तो बढ़ी, हक नहीं
6000 की आबादी वाला हमारा गिगडियाल गांव 1965 तक पीओके में रहा। इसकी गवाही गांव के पास मौजूद सीमा पर मौजूद सेना के बंकर आज भी देते हैं। गांव के बाहर खंडहर में बदल रहे बंकरों को कभी सेना दुश्मन पर निगरानी और युद्ध के समय उपयोग करती थी। 1965 की लड़ाई में शौर्य का प्रदर्शन करते हुए सेना ने गिगडियाल को भारत की सीमा में शामिल कराने की सफलता हासिल की।