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चुनाव: देश में 85% सेब पैदा कर रहा जम्मू कश्मीर, न नकली दवाओं पर रोक लगी, न मिली बड़ी मंडी, पढ़ें ये रिपोर्ट

Mon, 15 Apr 2024 05:46 PM IST
kumar गुलशन कुमार अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू कश्मीर

सार

जम्मू-कश्मीर में 25158.2 हजार हेक्टेयर में बागवानी है। 1991-2001 में 14070 हजार हेक्टेयर तो 2001-2011 तक बागवानी का रकबा 19218.1 तक बढ़ा। रकबा तो दस साल के अंतराल में बढ़ा लेकिन चुनौतियां कम नहीं हुईं।
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सेब की पैदावार (फाइल) - फोटो : बासित जरगर
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विस्तार
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देश में 85 फीसदी सेब पैदा कर और जीडीपी में 9.8 फीसदी का योगदान देने वाले जम्मू-कश्मीर के 7.8 लाख बागवानों को राजनेताओं ने आज तक सेब की तरह ही सुर्ख सपने दिखाए हैं। हकीकत में दुर्गम पहाड़ी इलाकों में सेब उगाने वाले किसानों के लिए जमीन पर आज भी समस्याओं के पहाड़ हैं। सबसे बड़ा मुद्दा यहां सेब के लिए ग्रेडिंग मशीन, एंटी हेल नेट गन, खराब गुणवत्ता की दवाएं, मंडीकरण, मूल्य संवर्धन का ढांचा न होना और वायरस वाली पौध है।

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इतना ही नहीं सेब की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए सबसे बुनियादी सुविधा वैक्सिंग (मोम की परत चढ़ाना) तक नहीं है। इसके अलावा भी बागवानों की कई समस्याएं हैं जो चुनावी मुद्दा तो बनती हैं लेकिन खत्म नहीं होतीं। आजादी के बाद से आज तक सेब के बाग तो बढ़े लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं होने से बागवानों की समस्याएं नहीं घटीं। इसके विपरीत देश में कुल फल उत्पादन का 15 फीसदी पैदा करने वाले हिमाचल में सरकार की तरफ से जम्मू-कश्मीर की तुलना में दोगुनी सुविधाएं हैं। सरकार की भागीदारी नहीं होने से इतना सेब पैदा करने के बावजूद जम्मू-कश्मीर विदेश में केवल 5 लाख टन ही बेच पा रहा है।

जम्मू-कश्मीर में 25158.2 हजार हेक्टेयर में बागवानी है। 1991-2001 में 14070 हजार हेक्टेयर तो 2001-2011 तक बागवानी का रकबा 19218.1 तक बढ़ा। रकबा तो दस साल के अंतराल में बढ़ा लेकिन चुनौतियां कम नहीं हुईं। बागवानों को हर बार चुनाव के समय फलों के अच्छे दाम दिलाने का वादा किया जाता है मगर चुनाव के बाद हालात नहीं बदलते। बागवानी विभाग के अनुसार 2024-25 के तहत सेब की पैदावार 25 लाख एमटी रखी गई है। बर्फबारी दिसंबर के बजाय जनवरी के अंत में होने से पैदवार प्रभावित होगी। क्यास हैं कि 21 लाख एमटी के आसपास पैदावार हो सकती है।
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इसके अलावा मौसम की बेरुखी यानी ओलावृष्टि और तूफान के कारण हर साल 20 फीसदी फसल बर्बाद हो जाती है। सेब के अलावा प्रदेश में नाशपाती, खुबानी, आड़ू, पल्म, चेरी, लीची, आम, अनोला, अमरूद, कीवी, स्ट्राबेरी, संतरा, नींबू की 21 लाख 40 हजार 148 टन पैदावार हो रही है। ड्राईफ्रूट में अखरोट, बादाम और अन्य फ्रूट की पैदावार दो लाख एमटी के आसपास हो रही है।

सरकार को चिंता नहीं, पांच लाख टन सेब बगीचे में हो रहा बर्बाद

सेब को तूफान से बचाने के लिए प्रदेश में जाला योजना चल रही है बावजूद इसके बीते साल एक लाख टन सेब बगीचों में ही तूफान की वजह से खराब हो गया। ओलावृष्टि और बेमौसमी बारिश से बगीचों को बचाने के लिए एंटी हेल नेट गन (ऐसी गन जिससे बादलों को हटाकर बेमौसमी बारिश और ओवावृष्टि से बचा जा सकता है) की सुविधा नहीं है।

जानकारी के अनुसार साल 2023-24 के लिए बागवानी विभाग ने 21 लाख एमटी पैदावार का लक्ष्य रखा था लेकिन उत्पादन 20 लाख टन के करीब हुआ। क्योंकि तूफान ने एक लाख टन सेब बगीचे में ही गिराकर खराब कर दिया। 2022-23 में भी तूफान से छह लाख टन फसल बर्बाद हुई। तूफान हर साल बीस फीसदी फसल को बर्बाद कर रहा है। सरकार को इसकी कोई चिंता नहीं है। बागवानी विभाग के कहने पर एक प्राइवेट कंपनी ने सी ग्रेड के सेब का पल्प बनाने की मशीनरी स्थापित की है। इससे किसानों के सेब से चिप्स बनाए जा रहे हैं। इससे पहले इस सेब की कीमत नहीं मिल पाती थी।
 

सीधा दिल्ली पहुंच रहा सेब, एक्सपोर्ट बंगलादेश तक सीमित

बागवानों का एक बड़ा मुद्दा प्रदेश में सेब के लिए बड़ी मंडी नहीं होना भी है। सेब यहां से स्थानीय मंडी के जरिये एक्सपोर्ट होना चाहिए जबकि हो उल्टा रहा है। ग्रेडिंग के लिए मशीन नहीं होने से सेब सीधा दिल्ली की आजादपुर मंडी जा रहा है और वहीं से बंगलादेश या फिर कभी-कभार अमरीका एक्सोपोर्ट होता है। यहां के बागवान आज भी सेब की ग्रेडिंग हाथ से ही करते हैं। वैक्सिंग नहीं होने से सेब बाहर बेचने की क्वालिटी वाला नहीं बन पाता। बागवानी विभाग के एक सेवानिवृत्त अधिकारी ने बताया कि पहले प्रदेश में कलरिंग मशीन भी नहीं थी लेकिन सरकार पर दबाव बनाने के बाद यह मशीनें स्थापित की गईं। अब सेब का रंग के हिसाब से चुनाव करना पहले से आसान हो गया है।

नकली दवाओं और पौधों को क्वारेंटाइन न कर पाना घटा रहा पैदावार

सेब उत्पादकों के सामने प्रदेश में नकली दवाओं का कारोबार नहीं रुक पाने की भी समस्या है। हाल ही में कुलगाम और शोपियां में बागवानों के लिए आई दवा की जब सैंपलिंग की गई तो वो चूना निकली। इतनी महंगी दवा खरीदकर भी जब असर नहीं होता को बागवान का बड़ा आर्थिक नुकसान होता है। इसकी सरकार की तरफ से कोई भरपाई भी नहीं है, हां फसल बीमा जरूर है। दूसरी बड़ी समस्या सेब की पौध से है। सेब की पौध केंद्र से लेकर प्रदेश सरकार कहां से लाती है इसका भी पता नहीं चल पाता। पौध लाए जाने से पहले उसको क्वारेंटाइन करने का नियम है लेकिन इसका पालन नहीं हो रहा। नतजीतन वायरस वाली पौध आने से बागवान का नुकसान हो जाता है।
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500 रुपये खर्च और 400 में बिक रही सेब की पेटी

सेब की पेटी (20 से 25 किलो भर्ती) का औसतन दाम प्रदेश में 400 रुपये मिल रहा है जबकि इतना सेब पैदा करने में खर्च ही 500 रुपये आ जाता है। जब बागवान स्थानीय स्तर पर दाम न मिलने से अपनी पैदावार को दूसरे प्रदेश में ले जाने का प्रयास करता है तो हाईवे सबसे बड़ी परेशानी पैदा करता है। राष्ट्रीय राजमार्ग बंद रहने से ट्रकों में ही फसल का रंग खराब हो जाता है और दाम आधा रह जाता है। जम्मू-कश्मीर का सेब अगस्त से शुरू हो जाता है और नवंबर तक रहता है। यही वो समय होता है जब हाईवे सबसे ज्यादा बंद रहता है। सरकार इसका आज तक कोई विकल्प नहीं ढूंढ पाई है।

पर्यटन से ज्यादा पैसा बागवानी पर खर्च होना चाहिए

बागवानी विभाग से सेवानिवृत्त अधिकारी मुख्तार खान ने बताया कि 25 लाख टन सेब पैदावार के साथ 7.8 लाख परिवार जुड़े हुए हैं। यह परिवार प्रदेश की जीडीपी में 9.8 फीसदी के हिस्सेदार हैं। इतनी बड़ी हिस्सेदारी के बावजूद पर्यटन पर पैसा फूंका जा रहा है जबकि बागवानी पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। पर्यटन की ही तरह अगर बागवानी पर पैसा लगे तो जीडीपी में योगदान और बढ़ेगा। बागवानों की जिंदगी बदलेगी और प्रदेश की सूरत।

योजनाओं से लाभ पहुंचा रहे

बागवानी का दायरा बढ़ रहा है। अलग अलग योजनाओं के माध्यम से लाभ पहुंचाया जा रहा है। तूफान से नुकसान पर बीमा योजना का लाभ भी दिया जा रहा है। - डॉ. प्रशांत बख्शी, एचओडी, बागवानी विभाग

फसल मंडियों तक पहुंचाने की सुविधा दे रहे

बागवानों के लिए कई योजनाएं चलाई गई हैं। तूफान से बचाने के लिए जाला योजना चल रही है। सेबों के पौधों को कवर किया जा रहा है। फल पकने के बाद मंडियों तक पहुंचाने की सुविधा भी दी जा रही है। - चमन लाल, निदेशक, बागवानी विभाग
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