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नम हो जाती हैं स्वर्णो देवी की आंखें...

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सांबा शहीद अरुण खेत्रपाल को श्रदांजली देते हुए
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सांबा। भारत-पाक 1971 के युद्ध को अरसा बीत गया है, लेकिन शहीद का परिवार आज भी विजय दिवस पर उस दिन को नहीं भूल रहा है। 80 वर्षीय स्वर्णो देवी वीर पति नायब सूबेदार सेवाराम को याद करते ही आंखें नम कर लेती हैं। वह पति के देश के प्रति शहीद होने का गर्व आज भी महसूस करती हैं। वह उन पलों को याद करती हैं।
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स्वर्णों देवी बताती हैं कि नवंबर के अंत में भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध के बादल मंडरा रहे थे। छुट्टी पर गए सैनिकों को बुलाने की तैयारी हो रही थी, लेकिन मेरे पति ने इंतजार नहीं किया और खुद ही यूनिट 21 पंजाब में जा पहुंचे। उस समय जम्मू के रानी बाग सतवारी कैंट क्षेत्र में रहते थे। मैं गर्भवती थी, घर का निर्माण चल रहा था। क्योंकि हम सीमावर्ती क्षेत्र के रहने वाले थे। युद्ध के हालात देख मेरे पति रेजिमेंट में चले गए। 3 दिसंबर को भारत-पाक के बीच युद्ध शुरू हो गया। पुंछ की कृष्णा घाटी सेक्टर में पाकिस्तान ने कब्जे का प्रयास किया। वहां 21 पंजाब रेजीमेंट तैनात थी। पंजाब रेजीमेंट के जवानों ने जांबाजी से पाकिस्तान के दांत खट्टे कर दिए। पाकिस्तान हार देखकर बौखला गया। 10 दिसंबर की रात को इसी सेक्टर की नंगी टेकरी पोस्ट पर हमला किया गया। पोस्ट पर तैनात वीर जवानों ने पाकिस्तान को धूल चटा दी और उसे भारी नुकसान हुआ। उनके अधिकतर सैनिक मारे गए, कुछ भाग गए। इस युद्ध में कृष्णा घाटी नंगी टेकरी पुंछ में 21 पंजाब बटालियन के जवानों ने शहादत देकर इस युद्ध को जीता। युद्ध में 21 पंजाब के 23 जवान शहीद हुए। इस युद्ध में मेरे पति नायब सूबेदार सेवाराम बहादुरी से लड़ते हुए शहीद हो गए। उस समय हालात ऐसे नहीं थे कि शहादत के बाद जवानों के पार्थिव शरीर को घरों में भेजा जाता। इसलिए मेरे पति का पार्थिव शरीर भी अंतिम दर्शन के लिए घर नहीं आ सका।
हमारे रिश्तेदार सूबेदार रमणीक सिंह उसी क्षेत्र में अलग यूनिट में तैनात थे। उन्होंने शहीद सेवाराम का अंतिम संस्कार कराया। एक सप्ताह बाद अस्थियां लेकर आए। हमें सूचना दी गई। मुझे आज भी वह दिन याद है और मैं यही कहती हूं कि मुझे गर्व है अपने पति पर। मेरे पति शहीद नायक सूबेदार सेवाराम को रक्षा मेडल और सेवा मेडल भी मिले हैं। आज 50 साल हो गए भारत-पाक 1971 युद्ध को हुए, लेकिन सबसे अच्छी बात यह है कि 50 साल बाद भी 21 पंजाब यूनिट अपने शहीद परिवारों को नहीं भूला है। दो-तीन साल से 21 पंजाब यूनिट जो अमृतसर वाघा बॉर्डर रोड पर थी, उन्होंने मुझे और मेरे परिवार को हर साल दिसंबर 11 को यह दिन मनाने के लिए और श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए परिवार सहित वहां बुलाया और पूरी इज्जत मान के साथ परिवार और मुझे वहां सम्मान दिया।
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इस बार दिल्ली के इंडिया गेट वार मेमोरियल पर भी हमें सलामी देने के लिए बुलाया गया, लेकिन मेरी सेहत ठीक न होने के कारण मैं वहां जा नहीं सकी, लेकिन मेरा परिवार वहां गया और वहां वीर जवानों के साथ-साथ मेरे पति को भी श्रद्धांजलि भेंट की गई। इससे पहले भी इन 50 साल में जब-जब भी मेरे पति की यूनिट को मौका मिला वह देश के किसी भी कोने में थे। उन्होंने हमें हर बार न्योता दिया कि हम इस दिन को यूनिट में जाकर मना सकें। देश के कई कोनों में मुझे जाने का मौका मिला और मैं उन दिनों को कभी भुला नहीं सकती। आज मेरा परिवार जिसमें मेरे तीन बच्चे अपनी-अपनी जगह अच्छी तरह से जिंदगी जी रहे हैं। अपने पिता की शहादत को वह भी गर्व महसूस करते हैं। मैं अभी भी अपने बच्चों के साथ वीर सैनिक कॉलोनी जम्मू में रहती हूं।
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