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जरा सी असावधानी विनाश लाती है

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प्रवचन करते संत सुभाष शास्त्री।
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अखनूर। गांव नरडी टाचढवां में देव स्थान बाबा राजा मंडलीक में सोमवार को श्रीमद्भागवत कथा में प्रवचन करते हुए संत सुभाष शास्त्री ने कहा कि इंद्रियों को विषयों के दल-दल में हम फंसा कर सुख की कामना करते हुए एक के बाद दूसरा पाप करते हुए जिये जा रहे हैं। इसका परिणाम केवल दुख और कष्ट है। पाप को कभी छोटा न समझा, क्योंकि विष किसी के भी प्राण ले सकता है।
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कथा वाचक ने किया कि जिस प्रकार एक छोटा बीज विशालकाय वृक्ष देने में सक्षम होता है, उसी प्रकार एक छोटा सा वृक्ष को जन्म पाप हमारा अनर्थ करने में पूर्णता सक्षम होता है। शास्त्री जी ने कहा कि मन में यह कभी विचार न लाना कि काम, क्रोध और लोभ का क्षणिक आवेश हमारा क्या बिगाड़ सकता है। इनसे सदा सावधान रहो, क्योंकि जरा सी असावधानी विनाश को शीघ्र बुला लाती है। 84 लाख योनियों के उपरांत जो मनुष्य शरीर हमें मिला है, इसे आखिर जन्म समाक्षण चाहिए। इस जन्म में यदि मनुष्य कल्याण नहीं हुआ, तो किसी जन्म में नहीं हो सकता। यह हमारे पर प्रभु की अपार कृपा है कि उन्होंने हमें मनुष्य जन्म दिया। अगर भगवान चाहते तो हमें किसी और योनि में भी जन्म दे सकते थे। इसलिए आप अपना कल्याण उसका (प्रभुका) स्मरण करते हुए कर सकते हैं, फिर चाहे आप गृहस्थी, ब्रह्मचारी, वाणप्रस्थी या सन्यासी हो। चाहे ब्राह्मण्र, क्षत्रिय, वैश्य या किसी जाति के हों, सभी उसके स्मरण के द्वारा कल्याण कर सकते हैं।
हर व्यक्ति का समाज के प्रति कुछ न कुछ दायित्व
गांव सदवाल में सत्संग का आयोजन
संवाद न्यूज एजेंसी
घगवाल। सीमावर्ती गांव सदवाल में पांच दिवसीय सत्संग में संत गंगाधर महाराज ने प्रवचन में कहा कि सत्संग का मतलब सत्य का संग करना होता है। अथवा हमें हमेशा सत्य के पथ पर ही चलना चाहिए। उन्होंने युवाओं को सही दिशा में चलने को कहा।
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संत जी ने कहा कि हर व्यक्ति का समाज के प्रति कुछ न कुछ दायित्व होता है। इस निभाने के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए। इन दायित्वों में देश के प्रति कुछ करना, हमारा प्रमुख दायित्व है। हमें किसी न किसी रूप में इसे पूरा भी करना चाहिए। जरूरतमंदों की मदद, भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने के लिए हमें हमेशा आगे आना चाहिए। युवा पीढ़ी को संस्कारवान बनाना, उसे अच्छे-बुरे की समझ कराकर हम अच्छे समाज का निर्माण कर सकते हैं। आज की युवा आधुनिकता के रंग में संस्कारों, नैतिकता और बड़ों का आदर करना भूल रही है। हमारा दायित्व है कि युवा पीढ़ी को सही दिशा दिखाई जाए। यह दिशा सत्संग सुन कर आती है। कैसे भगवान श्रीराम ने माता पिता की आज्ञा का पालन करते हुए चौदह वर्ष का वनवास काटा। सत्संग सुनने के लिए दूर दराज क्षेत्रों से भी श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।
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