हाईकोर्ट ने कहा-बैंक अफसरों का अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम करना गंभीर कदाचार
जम्मू। जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने साफ किया है कि कोई बैंक अधिकारी सिर्फ इसलिए अनुशासनात्मक कार्रवाई से नहीं बच सकता कि उसके कामों से कोई आर्थिक नुकसान नहीं हुआ या फायदा हुआ। कोर्ट ने माना कि बैंकिंग सेक्टर में तय अधिकार-क्षेत्र से बाहर जाकर काम करना ही अपने आप में गंभीर कदाचार है।
जस्टिस सिंधु शर्मा और जस्टिस राजेश सेखरी की डिवीजन बेंच ने यह टिप्पणी जम्मू-कश्मीर ग्रामीण बैंक और अन्य की अपील को मंजूरी देते हुए की। यह अपील एक सिंगल जज के फैसले के खिलाफ थी। इसमें बैंक के पूर्व अधिकारी रछपाल सिंह पर लगाई गई अनुशासनात्मक सजा को रद्द कर दिया गया था। डिवीजन बेंच ने सिंह की सजा को बहाल करते हुए उन्हें ऑफिसर स्केल-I के सबसे निचले स्तर (48,170 रुपये की बेसिक पे) पर कर दिया, लेकिन साथ ही उनके रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले लाभ को रोकने के आदेश को रद्द कर दिया और बैंक को उन्हें तुरंत जारी करने का आदेश दिया। साथ ही बैंक को बकाया लोन की रकम वसूलने के लिए उचित कानूनी कदम उठाने की छूट दी। जेएनएफ
चुनिंदा उधारकर्ताओं को लोन और
एडवांस मंजूर करने का है मामला
यह विवाद बैंक की सिंबल मोड़ ब्रांच में शाखा प्रमुख के तौर पर कार्यरत रछपाल सिंह से जुड़ा था। बैंक का आरोप था कि उन्होंने ऑपरेशनल गाइडलाइंस का उल्लंघन करते हुए चुनिंदा उधारकर्ताओं को अनुचित फायदा पहुंचाया। लोन व एडवांस मंजूर किए। एक जांच अधिकारी ने तीन फरवरी, 2022 को सौंपी रिपोर्ट में कहा कि एक आरोप को छोड़कर बाकी सभी आरोप सिंह के खिलाफ साबित हुए। इसके बाद अनुशासनात्मक अथॉरिटी ने उन्हें ऑफिसर स्केल-2 के सबसे निचले स्तर पर कर दिया और आदेश दिया कि उनके रिटायरमेंट के लाभ घटी हुई सैलरी के आधार पर जारी किए जाएं। इसके खिलाफ सिंह ने अपील की।
बैंक को आर्थिक नुकसान न
देख सिंगल जज ने रद्द की थी सजा
सिंगल जज ने बैंक को कोई आर्थिक नुकसान और सिंह को कोई आर्थिक फायदा न पाते हुए सिंह की सजा को रद्द कर दिया था। ज्यादातर अनियमितताओं को पहले ही ठीक कर लिया गया था। डिवीजन बेंच ने कहा कि अनुशासनात्मक सज़ा के मामले में न्यायिक समीक्षा का दायरा सीमित है और रिट कोर्ट सबूतों का दोबारा मूल्यांकन नहीं कर सकती।