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Jammu News: पूर्व बीडीओ और ग्रामीण विकास अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर रद्द

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जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने गलत जानकारी देने पर शिकायतकर्ता के खिलाफ कार्रवाई का दिया आदेश
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जम्मू। आपराधिक कानून के गलत इस्तेमाल से जुड़े मामले में जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने पूर्व बीडीओ खादिम हुसैन और ग्रामीण विकास विभाग के अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर को रद्द कर दिया। साथ ही गलत जानकारी देने पर पुलिस को शिकायतकर्ता के खिलाफ कार्रवाई के आदेश दिए।
जस्टिस एमए चौधरी ने खादिम हुसैन, अरुण गंडोत्रा, जमालदीन और मोहम्मद अशरफ की याचिका को स्वीकार करते हुए ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट, मुंसिफ महोर के सात दिसंबर, 2020 के आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें केस दर्ज करने के निर्देश दिए गए थे। पूर्व बीडीओ और ग्रामीण विकास अधिकारियों के खिलाफ आईपीसी की धाराओं 420, 409, 109 और 506 के तहत एफआईआर की गई थी। करीब छह साल पुराने इस मामले में फैसला बीती तीन अगस्त को सुरक्षित रखा गया था। इसे सात अगस्त को सुनाया गया। याचिकाकर्ताओं में खादिम हुसैन (जो अभी पंचायत इंस्पेक्टर हैं), अरुण गंडोत्रा (टेक्निकल असिस्टेंट), जमालदीन (विलेज लेवल वर्कर) और मोहम्मद अशरफ (ग्राम रोजगार सेवक) शामिल थे। जेएनएफ
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यह था मामला
अब्दुल गनी ने शिकायत देकर मनरेगा के तहत किए कामों में मजदूरी का भुगतान न करने और गड़बड़ियों का आरोप लगाया था। याचिकाकर्ताओं ने मजिस्ट्रेट के आदेश को मुख्य रूप से इस आधार पर चुनौती दी थी कि काम के दौरान अनिवार्य सुरक्षा उपायों का पालन नहीं किया गया। तर्क दिया कि मजिस्ट्रेट के पास जाने से पहले शिकायतकर्ता ने न तो सीआरपीसी की धारा 154(1) के तहत एसएचओ से संपर्क किया और न ही धारा 154(3) के तहत एसपी से। शिकायत के साथ जरूरी शपथ पत्र भी नहीं लगाया गया था।

रिकॉर्ड से पता चली सच्चाई
रिकॉर्ड से पता चला कि अब्दुल ने 2017 और 2020 के बीच काम किया। विभाग ने उनकी मजदूरी के 13,062 रुपये उनके बैंक खाते में जमा कर दिए। शिकायतकर्ता ने बाद में हाईकोर्ट के सामने खुद माना कि उन्हें अपनी मजदूरी मिल गई थी और कहा कि उन्हें एफआईआर रद्द करने पर कोई आपत्ति नहीं है। दावा किया कि एफआईआर कुछ वेंडरों को भुगतान न किए जाने को लेकर गलतफहमी में दर्ज कराई गई थी।


सरकार ने दर्ज कराई थी आपत्तियां
सरकार ने गड़बड़ी के आरोप लगाते हुए कई आपत्तियां जताई थीं। एक शुरुआती जांच में पता चला कि पंचायत सरह अपर में अलग-अलग योजनाओं के तहत 10 फीसदी काम केवल जमीन पर हुए थे। कई कामों के लिए मटीरियल के भुगतान का पैसा गलत तरीके से इस्तेमाल किया गया। दावा किया गया कि खादिम हुसैन को या तो सीधे या जाली हस्ताक्षरों और वेंडर व्यवस्थाओं के जरिये फायदा पहुंचाया गया। हाईकोर्ट ने इन्हें चुनौती दी गई एफआईआर के तहत साबित आपराधिक दायित्व नहीं माना। जांच करने वाले पक्ष ने महोर सब-डिविजन की 20 पंचायतों में 70 करोड़ से ज्यादा के गबन का भी आरोप लगाया, लेकिन हाईकोर्ट ने आरोपों और असल में उसके सामने मौजूद आपराधिक मामले के बीच फर्क किया।
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सबूत बगैर अनियमितता के आरोप आपराधिक अपराध नहीं
हाईकोर्ट ने मामले में एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि आरोप सामान्य प्रकृति के थे और याचिकाकर्ताओं पर व्यक्तिगत रूप से कोई खास आपराधिक कृत्य या चूक का आरोप नहीं था। प्रशासनिक कामकाज में अनियमितता के केवल आरोप, जिनमें बेईमानी की नीयत, धोखाधड़ी से उकसाने, आपराधिक विश्वासघात या डराने-धमकाने का कोई ठोस सबूत न हो, अपने आप में कोई आपराधिक अपराध नहीं माने जा सकते।
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