जम्मू। जम्मू-कश्मीर व लद्दाख हाईकोर्ट ने सीआरपीएफ के एक अफसर को बड़ी राहत दी है। अदालत ने उनकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एपीएआर) में दर्ज प्रतिकूल टिप्पणियां रद्द करते हुए कहा कि ये टिप्पणियां पक्षपात और दुर्भावना से की गई थीं।
केंद्र सरकार और सीआरपीएफ को उनके प्रमोशन पर दोबारा विचार करने का आदेश दिया गया है। यह फैसला न्यायमूर्ति एमए चौधरी ने सीआरपीएफ अधिकारी विकास चौधरी की याचिका पर सुनाया। विकास चौधरी रेंज मुख्यालय हीरानगर में टूआईसी के पद पर तैनात हैं।
उन्हें वर्ष 2018-19 की एपीएआर में ‘गुड’ दर्ज किया गया था जबकि उनके बाकी सभी वर्षों की रिपोर्टें ‘बहुत अच्छी’ या ‘उत्कृष्ट’ रहीं। उन्हें वीरता पदक और कई प्रशंसापत्र मिल चुके हैं। विकास ने अदालत को बताया कि उनके कमांडेंट मनीष कुमार मीणा और डीआईजी एसके मिश्रा ने व्यक्तिगत रंजिश और भ्रष्टाचार में साथ न देने के कारण उनकी रिपोर्ट खराब की। दोनों अधिकारियों ने उनसे अनुचित काम करवाने की कोशिश की और मना करने पर बदले की भावना से उनकी ग्रेडिंग घटा दी।
अदालत ने पाया कि जिसने चौधरी की एपीएआर को अंतिम रूप दिया, उसने केवल 44 दिन तक ही उन पर निगरानी रखी थी, जबकि नियमों के अनुसार यह अवधि कम से कम 90 दिन होनी चाहिए। न्यायमूर्ति चौधरी ने कहा कि वरिष्ठ अधिकारियों को अपने अधीनस्थों का मार्गदर्शन करना चाहिए था, लेकिन यहां उल्टा हुआ, उन्होंने द्वेष और दुर्भावना से अफसर का करियर बिगाड़ने की कोशिश की। जेएनएफ