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देश में 1700 कानूनों को बदलने की जरूरत

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सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर ने कहा कि देश के 1700 कानून बदलने की जरूरत है। वर्षों पुराने इन कानूनों में से 300 बदले भी जा चुके हैं। इन कानूनों को बदलना चुनौती नहीं है, लेकिन इसे लागू करना जरूर चुनौतीपूर्ण कार्य है।
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इसके साथ ही उन्होंने कहा कि कि केंद्र और राज्य सरकारों के प्रदर्शन का भी आडिट होना चाहिए। सरकार के कामकाज के आकलन के लिए प्रणाली विकसित करने की जरूरत है। केंद्र सरकार की ओर से कई योजनाएं बनाईं जाती हैं, लेकिन राज्य सरकारें उन्हें समय पर लागू नहीं करतीं।

जस्टिस ठाकुर शनिवार को जेएंडके लीगल सर्विसेज अथारिटी की ओर से ‘असंगठित क्षेत्र के मजदूर : उनकी आकांक्षाएं, चुनौतियां और आगे का रास्ता’ विषय पर आयोजित कांफ्रेंस को संबोधित कर रहे थे।
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सरकारी स्कीमें तो बनतीं हैं, लेकिन लागू नहीं हो पाती

जस्टिस ठाकुर ने कहा कि देश के असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए योजना बनाई गई, लेकिन अब तक उसे लागू करने के लिए बोर्ड नहीं बन पाए। हालत यह है कि असंगठित क्षेत्र में मजदूरी करने वाले 80 फीसदी से ज्यादा मजदूरों को उनके अधिकारों की जानकारी नहीं है।

असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए प्रदेश सरकारें सेस (उप कर) एकत्रित तो कर रही हैं, लेकिन उसका उपयोग नहीं हो पा रहा। इसके लिए बाकायदा विभाग बनाए गए। उनके पास योजनाएं हैं, लेकिन इसका लाभ उठाने वालों को जानकारी तक नहीं होती।

हाईकोर्ट में मामलों के लंबित होने और लोगों को समय पर न्याय न मिल पाने के लिए चीफ जस्टिस ने उचित प्रबंध तंत्र न होने को जिम्मेदार ठहराया। कहा कि विभिन्न उच्च न्यायालयों में 450 उच्च न्यायिक अफसरों के पद खाली हैं। 50 फीसदी क्षमता से काम चलाया जा रहा है।

न्याय के इंतजार में लोग जेलों में हैं। नियुक्ति की प्रक्रिया को जल्द पूरा करना होगा। अभी हाल में 150 पदों के लिए मंजूरी मिल चुकी है। जल्द ही शेष खाली पदों को भी भरा जाएगा। न्यायिक प्रक्रिया में ऐसा तंत्र होना चाहिए, जिससे इस तरह की समस्याएं उत्पन्न न हों।

चीफ जस्टिस ने कहा कि न्यायपालिका पर अक्सर अधिकार क्षेत्र के बाहर जाकर हस्तक्षेप करने के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायपालिका का हस्तक्षेप उचित है।
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कार्यक्रम के दौरान चीफ जस्टिस की आंखों से निकले आंसू

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस तीर्थ सिंह ठाकुर बेहद जज्बाती दिल रखते हैं। इसका अंदाजा महज इसी से लगाया जा सकता है कि हाईकोर्ट में अपनी आधी से ज्यादा स्पीच उन्होंने रोते हुए की।

यहां तक की स्टेज छोड़ते वक्त भी उनके आंसू नहीं थमे। वह अपनी सीट तक रोते-रोते हुए पहुंचे। उनके साथ बैठे सुप्रीम कोर्ट के अन्य दो जजों और लोगों ने सहारा देकर उन्हें कुर्सी पर बिठाया।

जम्मू हाईकोर्ट बार एसोसिएशन की ओर से आयोजित किए कार्यक्रम में चीफ जस्टिस अपने पुराने दिनों को याद कर बेहद भावुक हो उठे। किस तरह से देश के अलग-अलग हिस्सों में अपनी सेवाएं देते हुए उन्होंने अकेलापन महसूस किया। वो सब उनके संबोधन में साफ दिखा।
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