पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल को जम्मू-कश्मीर के लिए स्वर्ण युग के रूप में देखा जाता है। उन्होंने कश्मीर मसले के हल का तीन सूत्री फार्मूला दिया था। इंसानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत का। यानी पूरी कश्मीरी संस्कृति को मौजूदा लोकतांत्रिक ढांचे में इंसानी दायरे में सुरक्षित रखना। यही वजह है कि मुफ्ती मोहम्मद सईद, महबूबा मुफ्ती से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक वाजपेयी के इस फार्मूले के कायल हैं और कश्मीर मसले का हल इसी फार्मूले से करने की वकालत करते रहे हैं।
कश्मीर के सियासतदान मानते हैं कि यदि उन्हें कुछ और मौका मिला होता तो शायद कश्मीर मसले का हल निकल सकता था। उनके समय में पाकिस्तान के साथ सीजफायर उल्लंघन की घटनाओं पर रोक लगी थी। दोनों देशों के बीच रिश्ते मधुर बनाने के लिए श्रीनगर से मुजफ्फराबाद तक कारवां ए अमन तथा पुंछ से रावलाकोट तक राह ए मिलन बस सेवा शुरू हुई।
अटल जी के कार्यकाल में ही पाकिस्तान के लिए सीधी बस सेवा शुरू हुई। अलगाववादियों से बातचीत की पहल की। श्रीनगर तथा पुंछ से शुरू हुई इस बस सेवा से पीओके तथा रियासत के लोग अपने बिछड़े परिजनों से परमिट लेकर मिलने जुलने आ-जा सकते हैं। यह बस सेवा अब भी जारी है। उत्तरी कश्मीर के उड़ी के सलामाबाद जहां से बस सेवा गुजरती है वहां झेलम नदी पर बने पुल का नामकरण भी अटल कमान सेतु किया गया। उड़ी के सलामाबाद तथा पुंछ के चक्कां दा बाग से क्रास एलओसी ट्रेड की भी शुरूआत भी अटल और मुफ्ती मोहम्मद सईद की ही सोच बताई जाती है।
रियासत में पोटा का किया था खात्मा
पहली बार पीडीपी के साथ मंच साझा करते पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी
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प्रधानमंत्री रहते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने पहली बार पीडीपी का मंच साझा किया था। इस मंच से उन्होंने शांति की अपील की थी। तब उन्होंने कहा था कि बातचीत से ही सारे मसले हल होंगे। बंदूक से किसी समस्या का समाधान नहीं होगा। समस्याओं का मिलजुल कर हल निकाला जाएगा। आप दिल्ली का दरवाजा खटखटाएं। केंद्र सरकार के दरवाजे कभी भी आपके लिए बंद नहीं होंगे। मुफ्ती के न्योता पर मंच साझा करने के बाद फारवर्ड इलाके से सेना की वापसी, बार्डर पर सीजफायर, पोटा का खात्मा तथा राजनीतिक बंदियों की रिहाई जैसे कदम उठाए गए थे।
अटल से प्रभावित होकर मुफ्ती बोलते थे यह जुमला
अटल से प्रभावित होकर ही पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती सईद अक्सर कहा करते थे कि बंदूक से न गोली से बात बनेगी बोली से। वह कहते थे कि पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से दोस्ताना रिश्ते होने चाहिए। अपने मुख्यमंत्रित्व काल में चाहे प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी रहे हों या फिर नरेंद्र मोदी वह हमेशा पाकिस्तान के साथ दोस्ताना संबंध की वकालत करते रहे हैं। उनके प्रयास से ही दोनों प्रधानमंत्री के कार्यकाल में कड़वाहट समाप्ति के प्रयास शुरू हुए।