वर्ष 1999 में पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान को धूल चटाने वाले अटल बिहारी वाजपेयी ही थे। कारगिल युद्ध में आपरेशन विजय के तहत भारत ने पाकिस्तान को हराया। वाजपेयी के नेतृत्व में ही भारतीय सेना ने लड़ाई लड़ी और जीत दर्ज की। यूं कहा जाए कि इस युद्ध के बाद देश के सैनिकों की शहादत का जिस कदर सम्मान होता है, वह सब अटल जी की ही देन है।
मई से जुलाई तक कारगिल युद्ध चला था। पाकिस्तानी सैनिक आतंकियों के साथ मिलकर कारगिल के द्रास, मसखोह वैली, बटालिक सेक्टर, टाइगर हिल, तोलोलिंग हिल में घुस आए। यह इलाका काफी ऊंचाई पर है। यहां पाकिस्तानी सैनिक चुपके-चुपके भारतीय सीमा में घुस आए थे। इसका पता चलने के बाद भारत ने कार्रवाई की। पाकिस्तान के एक हजार के करीब सैनिक मारे गए। भारतीय सेना के भी 567 सैनिक शहीद हुए।
पाकिस्तान ने तो अपने सैनिकों के शव तक लेने के लिए मना कर दिया, लेकिन कारगिल युद्ध में शहीद होने वाले एक-एक भारतीय सैनिक का शव उसके पैतृक गांव भेजा गया। इस युद्ध के बाद शहादत की परिभाषा ही बदल गई। मौजूदा दौर में किसी सैनिक के शहीद होने के बाद उसके परिवार को इतनी सहायता दी जाती है, जिससे परिवार का जीवन अच्छे से व्यतीत हो जाए। यह सब अटल बिहारी वाजपेयी की ही देन है।
शहीदों के नाम पर बने स्मारक
कारगिल युद्ध में शहीद होने वाले अधिकतर जवानों और अफसरों के नाम पर कहीं न कहीं स्मारक, सड़कें, गलियां, कालोनियां जरूर बनी हैं। यह सब वाजपेयी के समय ही हुआ। शहीदों के परिवारों को पेट्रोल पंप, नौकरियां देने की योजना भी उन्होंने ही शुरू की थी।
वापस जाने तक नहीं की बातचीत
कारगिल युद्ध के वक्त जब पाकिस्तानी सैनिकों से भारतीय सैनिक लोहा ले रहे थे तो पाकिस्तान ने अटल बिहारी वाजपेयी से बातचीत करने की पेश की। तब तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने प्रस्ताव भेजा, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया। कहा कि जब तक पाक सेना वापस नहीं जाएगी, तब तक कोई बातचीत नहीं होगी। भारत ने दो महीने में यह युद्ध जीता। पाकिस्तानी सैनिकों को भागने पर मजबूर कर दिया।