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अपनों की लाशों के लिए दर-दर भटक रहा युवक

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चौबीस साल पहले पंजाब से आकर श्रीनगर के जवाहर नगर इलाके में बसने वाला दंपति रियासत में आई बाढ़ का शिकार हो गया। महत्वपूर्ण बात यह है कि एक सप्ताह से इस मकान के नीचे दंपति सहित कुल 15 लोगों के शव घर के नीचे दबे हैं लेकिन प्रशासन ने अभी तक उन लाशों को निकालने के लिए कोई कदम नहीं उठाया है।
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परिवार में एकमात्र बचा सदस्य पलविंदर सिंह लगातार प्रशासन के पास लाशों को निकालने के लिए गुहार लगा रहा है, ताकि शवों का अंतिम संस्कार किया जा सके। वर्ष 1990 में श्रीनगर में बसने वाले पंजाबी परिवार के सदस्य पलविंदर सिंह ने ‘अमर उजाला’ से बातचीत के दौरान कहा कि पिछले रविवार को बाढ़ के पानी के कारण जवाहर नगर स्थित उनका मकान गिर गया।

इससे उसके माता-पिता, उनका कारीगर और उसी मकान में रहने वाले कुल 15 लोग, जिसमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं, मकान के मलबे में दब गए। चूंकि इलाके में पानी भरा हुआ था, इसलिए पहले तो पता नहीं चला। जब इसकी जानकारी मिली तो उन्होंने पाया कि मकान में रहने वाले लोग मलबे में दबे हुए हैं।
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इसके बाद उसने खुद भी प्रयास किए और सेना को भी मदद की गुहार लगाई लेकिन वह जिंदा लोगों को बचाने में ही जूझ रहे हैं। इसलिए उसकी किसी ने अभी तक मदद नहीं की है। पलविंदर ने कहा कि यदि उसके पिता निर्मल सिंह, मां अमरजीत कौर और अन्य दबे लोगों के शव मिल जाएं तो वह उनका अंतिम संस्कार कर सकेगा।

नहीं भूल पाएंगे सात सितंबर की वह सुबह

जम्मू के मीरां साहिब कसबे के गांव कृष्णा नगर के दो लोग श्रीनगर में आई बाढ़ के बीच पांच दिनों तक फंसे रहने के बाद रविवार को सातवें दिन घर पहुंचे। उनके घर पहुंचने के बाद सगे-सबंधियों ने राहत की सांस ली। सचिवालय के साथ कश्मीर गए सुशील शर्मा ने बताया सात सितंबर की सुबह वह कभी नही भूले पाएंगे। उन्होंने कहा कि तीन मंजिला ब्लू डायमंड होटल में रुके थे।

देखते-देखते दो मंजिल तक पानी भर गया। इससे लोगों में हड़कंप मच गया। कई लोगों को आंखों के सामने पानी में बहते देखा। कुछ बड़ी मुश्किल से जान बचाते हुए होटल की तीसरी मंजिल तक पहुंचे। होटल प्रबंधन ने लोगों को सुरक्षित रखने में हरसंभव कोशिश की। दो दिनों तक होटल की तीसरी मंजिल पर रहे। बाद में साथियों के साथ जीरो ब्रिज पर पहुंचे।

वहां पर चार दिनों तक भूखे-प्यासे रहने के बाद सेना के हेलीकाप्टर से गिराए गए पानी की बोतल और बिस्कुट से राहत मिली। पुल पर चार दिन गुजारने के बाद वहां से पैदल चलकर श्रीनगर के एयरपोर्ट पहुंचे। जान पहचान के व्यक्ति से रुपये उधार लेकर जम्मू पहुंचे। सुशील ने कहा कि जब लोगों को पानी में बहते देखा, तो एक बार को लगा कि अब वह भी परिवार के बीच सही-सलामत नहीं पहुंच पाएंगे।

इस तरह गांव के संजय पंडिता का कहना है कि होटल में फंस जाने के बाद छत के ऊपर हेलीकाप्टर दिखाई देते ही सफेद कपड़ा दिखाकर कई बार वहां से निकालने का इशारा करते रहे। बाद में कई किलोमीटर पैदल चलकर एयरपोर्ट पहुंचे। उन्होंने कहा कि अपने जीवन में इस तरह का जल तांडव कभी नहीं देखी, जिसने कई लोगों को अपनी आगोश में लिया। सेना की ओर से काफी लोगों को बचाया गया, लेकिन कुछ ऐसे भी रहे जिन्हें नहीं बचाया जा सका।

सेना न होती तो नहीं बचती जिंदगी

पांच दिन तक भूखे-प्यासे मकान की छत पर मदद के लिए पुकारते रहे, लेकिन कोई नहीं आया। छत से नीचे बहती लाशों को देखकर दिल पसीज जाता था। ऐसे में दिल में यह डर भी घर करता जा रहा था कि न जाने परिवार बच पाएगा कि नहीं। आखिरकार सेना की नजर उन पर पड़ी और जिसने इस परिवार को सुरक्षित बाहर निकाला।

ये बातें श्रीनगर से बसोहली अपने घर पहुंचे मोहनलाल ने बताईं। श्रीनगर के वजीरबाग, जवाहर नगर में रह रहे मोहनलाल ने बताया कि छह सितंबर को रात डेढ़ बजे लोगों के घरों में पानी घुस आया। ऐसे में उन्होंने बिना समय गंवाए अपनी पत्नी ज्योति, बेटे उज्जवल और अभिषेक को लेकर छत पर चले गए।

उस समय उनके साथ उनके मकान मालिक सरदार टीपी सिंह और उनकी पत्नी भी उनके साथ थे। तीन दिन बाद सेना के लोग पहुंचे। वे बच्चों और महिलाओं को पहले बचाकर ले गए। वे दो दिन तक वहीं छत पर ही रहे। दो दिन बाद फिर जवान आए और उनको वहां से निकालकर गुरुद्वारा पहुंचाया। वहां से हेलीकाप्टर से उनको चंडीगढ़ भेजा गया।

वहां से वे लखनपुर के रास्ते बसोहली पहुंचे। उन्होंने कहा कि उनके लिए सेना के जवान किसी देवदूत की तरह हैं। यदि वे नहीं आते तो उन लोगों को बचना मुश्किल ही था।

आसमान में बादल देखकर कांप जाती है रूह

बीच में बारिश और बाद में धूप के कारण पहाड़ों पर रहने वाले लोग अब भी दहशत के साये में हैं। भूस्खलन की संभावनाओं के बीच लोगों को दो वक्त का निवाला भी नसीब नहीं हो रहा है। टेंटों में रहने को मजबूर लोगों के लिए अभी भी प्राकृतिक आपदा का डर है। हर पल आसमान देखकर प्रभावित लोग और सहम जाते हैं। बादल उन्हें डराने लगा है।

बाढ़ और भूस्खलन से प्रभावित जिले के 328 गांव के हजारों लोग ईश्वर से बस यही दुआ कर रहे हैं कि अब तो बस करो। रविवार की सुबह बारिश और काली घटाओं ने आम जिंदगी में खौफ पैदा कर दिया। बारिश के कारण राहत एवं पुनर्वास में दिक्कतें आ रही हैं। जिले का शायद ही ऐसा कोई क्षेत्र होगा, जहां इस आपदा का प्रभाव नहीं हुआ हो।

जिले से मिली रिपोर्ट के अनुसार अभी भी ऐसे गांव हैं, जहां भूस्खलन का खतरा बरकरार है। इन गांव से लोगों को हटा तो दिया है, लेकिन उनके मकानों के ध्वस्त होने से आशियाना उजड़ने का डर बना रहता है। जिलाधीश यशा मुद्गल का दावा है कि प्रभावित क्षेत्रों के लोगों को स्कूलों में सुरक्षित स्थानों पर ठहराया गया है।

उन्हें राशन पानी की सुविधा उपलब्ध कराई गई है। जिन लोगों के मकान टूटे हैं, उनके लिए नई जगह की तलाश कर बसाने का प्रयास है। घर भी टूट गए हैं। उन्हें इंदिरा आवास योजना के तहत मकान निर्माण के लिए मदद दी जाएगी। राहत कार्य युद्ध स्तर पर चल रहे हैं। पहाड़ों में कई जगह पर बीच-बीच में भूस्खलन हो रही। प्रशासन ने पहले ही पर्याप्त कदम उठाए हैं।
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सिविक बाडीज निष्क्रिय, लोग जला रहे हैं कूड़ा

हालात खुद-ब-खुद रास्ता दिखाते हैं। इस बात का अनुसरण करते हुए घाटी के बाढ़ प्रभावित लोग घाटी में लगे कूड़े के बड़े-बड़े ढेरों को जलाने का काम कर रहे हैं। पिछले दो हफ्तों से कश्मीर में सिविक बाडीज पूरी तरह से निष्क्रिय हो चुकी है। जम्मू कश्मीर की गर्मियों की राजधानी में सफाई का काम देखने वाला श्रीनगर नगर निगम और अन्य सिविक बाडीज लोगों के घरों और होटलों से कूड़े को इकट्ठा नहीं कर पा रहे हैं।

सड़कों के किनारे जमा कूड़े से अब बदबू उठना शुरू हो गई है। बीमारी न फैल जाए, इस बात को देखते हुए लोगों ने अब कूड़े को जलाना शुरू कर दिया है। एक स्थानीय नागरिक बशीर अहमद खान ने कहा, हम नहीं जानते कि सरकार तथा संबंधित एजेंसियों को वापस सक्रिय होते हुए कितना समय लगेगा लेकिन जिस तरह से गंदगी का अंबार लगा हुआ, उससे महामारी फैलने के पूरे आसार हैं।

रावलपोरा, रंगरेठ और हैदरपोरा में भी लोगों द्वारा गंदगी को जलाया जा रहा है। श्रीनगर नगर निगम में अभी कई फीट पानी भरा हुआ है। निगम को सक्रिय होने में समय लगेगा। कूड़ा उठाने वाली गाड़ियां भी पानी में फंसी हुई हैं।
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