सरकारी आंकड़े बताते हैं कि सुरक्षा कारणों से 1990 में 44167 कश्मीरी पंडित परिवारों ने घाटी छोड़ी थी, जिसमें से 39782 हिंदू परिवार थे। पुनर्वास के तहत पीएम पैकेज के जरिये नौकरी के लिए पिछले कुछ सालों में 3800 अभ्यर्थी कश्मीर लौटे। अनुच्छेद 370 हटने के बाद 520 लोग नौकरी के सिलसिले में गए। दो हजार और कश्मीरी विस्थापितों के नौकरी के सिलसिले में घाटी लौटने की संभावना है। सरकार की ओर से 2008 और 2015 में कश्मीरी विस्थापितों के घाटी लौटने और पुनर्वास की नीति तय की गई।
तीन दशक बाद भी धरातल पर कुछ भी बदलाव नहीं आया है। ब्यूरोक्रेट नहीं चाहते हैं कि पंडित घाटी लौटें। प्रधानमंत्री और गृह मंत्रालय से संस्तुति के बाद भी राज्य सरकार ने विस्थापितों के पुनर्वास के लिए अलग से बजट का प्रावधान नहीं किया। 370 हटने के बाद भी स्थितियां वहीं की वहीं हैं। सरकार निवेशकों को जमीन दे रही है, लेकिन विस्थापितों को दो गज जमीन नहीं दे पाई। ट्रांजिट आवास मनमोहन सरकार की देन है।
- सतीश महलदार, चेयरमैन-रिकन्सिलिएशन, रिटर्न एंड रिहैब्लिेशन आफ माइग्रेंट्स
370 हटने के बाद उम्मीद जगी थी कि पंडितों के प्रति कोई नीति बनेगी, लेकिन धरातल पर ऐसा कुछ भी नहीं दिख रहा। अल्पसंख्यकों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। 1990 के पहले की स्थिति बहाल करनी है तो इन्हें प्रतिनिधित्व देना होगा। जवाहर टनल के पार धर्मनिरपेक्षता कहीं भी नहीं दिखती। आखिर सरकार कश्मीर का विकास करना चाहती है या कश्मीरियों का। हमारे अधिकारों का संरक्षण करना भी सरकार की जिम्मेदारी है।
-डॉ. रमेश रैना, अध्यक्ष-ऑल इंडिया कश्मीरी समाज
धरातल पर कुछ भी बदलाव नहीं दिख रहा है। सरकार पीएम पैकेज के तहत नौकरियों को ही घाटी में वापसी मान रही है, जो उचित नहीं है। ऐसे लोग सरकारी मकानों में किराया दे रहे हैं। सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें आवास छोड़ना होगा, फिर कैसा पुनर्वास और कैसी घर वापसी। टारगेट किलिंग की घटनाओं के बाद जमीनों से कब्जे हटाने की प्रक्रिया भी धीमी पड़ गई है। सरकार सभी पक्षों से बात कर वापसी की दिशा में प्रयास करे।
- एमके धर, पनुन कश्मीर
सरकार की पुनर्वास योजना दिखनी चाहिए। सरकार को हमारी बात सुननी चाहिए। राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिए बगैर यह संभव नहीं है। परिसीमन की प्रक्रिया में विस्थापितों को भी आरक्षण मिलना चाहिए। उद्यमिता के जरिये पुनर्वास संभव है। इसके लिए सरकार को विस्थापितों को निवेश के मौके देने चाहिए। 370 हटने के बाद घाटी का माहौल बदला जरूर है, लेकिन यह धरातल पर तभी उतरेगा जब विस्थापित राजनीतिक रूप से सशक्त होंगे।
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- विनोद के पंडिता, संयुक्त सचिव-ऑल इंडिया कश्मीरी समाज