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लद्दाख तक नहीं पहुंची नोटा की हवा

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जम्मू। लोकसभा चुनाव के लिए सियासी गुणा भाग शुरू हो चुका है। हर कोई किसी न किसी पार्टी और प्रत्याशी को समर्थन देता है, लेकिन ऐसे हजारों मतदाता हैं, जो किसी भी प्रत्याशी को इस काबिल नहीं समझते कि उसे वोट दिया जाए, लिहाजा वह नोटा को चुनते हैं। 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान राज्य में 30243 वोटरों ने नोटा पर मुहर लगाई। इनमें जम्मू के 14760, जबकि कश्मीर के 15483 वोटर शामिल थे। लेकिन यह जानकर हैरत होगी कि लद्दाख अकेली ऐसी सीट रही, जहां नोटा की हवा नहीं पहुंची। यहां एक भी वोट नोटा को नहीं गया।
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कश्मीर संभाग की श्रीनगर और अनंतनाग ऐसी सीटें रहीं, जहां डेढ़ फीसदी से ज्यादा वोटर्स ने नोटा की बटन दबाई। जम्मू संभाग की उधमपुर सीट पर भी एक प्रतिशत से ज्यादा लोगों ने नोटा को वोट किया। बात 2017 में श्रीनगर में हुए उप-चुनाव की करें तो वहां भी नोटा करने वाले एक फीसदी से ज्यादा रहे। जहां हार-जीत में एक-एक वोट कीमती होता है, वहां एक प्रतिशत वोट की अहमियत समझी जा सकती है।


लोकसभा सीट नोटा चुनने वाले वोटर प्रतिशत
जम्मू 4282 0.35
उधमपुर 10478 1.01
श्रीनगर 4979 1.59
बारामुला 4568 0.98
अनंतनाग 5936 1.58
(2017 में हुए श्रीनगर उप चुनाव में नोटा पर 231 मत पड़े, जिसका प्रतिशत 1.04 था)

यह है नोटा
भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) ने 2013 में इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) में नोटा का विकल्प मुहैया कराया था। नोटा का मतलब है- नन आफ द अबव यानी कि वोटर किसी भी प्रत्याशी को वोट देने की इच्छा नहीं रखता। इस विकल्प के बाद नोटा को चुनने वाले बढ़ रहे हैं।
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