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Udhampur News: रेहड़ी पर 'दीदी का ढाबा' चलाकर कायम की महिला सशक्तीकरण की अनूठी मिसाल

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उधमपुर। निशा देवी अपनी रेहड़ी पर दीदी का ढाबा चलाती: संवाद
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ढाबे को एक छोटे रेस्तरां के रूप में विकसित करना चाहती है निशा
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संवाद न्यूज एजेंसी
उधमपुर।
उधमपुर के दोमेल इलाके में एक साधारण रेहड़ी आज महिला सशक्तीकरण की प्रेरणा बन गई है। निशा देवी, जो अपने छह सदस्यीय परिवार की एकमात्र कमाने वाली हैं, ने 'दीदी का ढाबा' नाम से चलाए जा रहे इस छोटे से रोजगार के जरिए न सिर्फ अपने परिवार को संकट से उबारा, बल्कि समाज को एक बड़ा संदेश भी दिया है।
16 साल पहले निशा की शादी जगदीश कुमार से हुई थी। चार बच्चों (दो बेटे और दो बेटियां) के इस परिवार को पति की मेहनत-मजदूरी से चलता था। पांच साल पहले जगदीश की अचानक तबीयत बिगड़ी तो परिवार की आय का एकमात्र स्रोत खत्म हो गया। निशा ने बताया, पहले मैंने लोगों के घरों में बर्तन मांजने का काम शुरू किया, लेकिन उससे घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था। बच्चों की पढ़ाई छूटने की नौबत आ गई थी।
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इस संकट के समय निशा ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने रेहड़ी पर ढाबा खोलने का निर्णय लिया। शुरू में बहुत शर्म और डर लगता था। लोग क्या कहेंगे, यह सोचकर रातों की नींद उड़ जाती थी, निशा याद करते हुए कहती हैं। लेकिन परिवार की जिम्मेदारी ने उन्हें हिम्मत दी। आज यही ढाबा उनके परिवार का मुख्य सहारा है, जिससे वह न सिर्फ घर का खर्च चला रही हैं, बल्कि बच्चों की पढ़ाई और पति के इलाज का खर्च भी उठा रही हैं।
निशा बताती हैं कि छोटे शहरों में एक महिला का इस तरह का काम शुरू करना आसान नहीं होता। लोग तरह-तरह की टिप्पणियां करते थे। कुछ लोगों को लगता था कि यह महिलाओं के लिए उचित काम नहीं है। लेकिन मैंने अपना मन मजबूत रखा और आज मेरे ढाबे पर हर वर्ग के लोग आते हैं।

निशा का मानना है कि महिलाओं को खुद को कमजोर नहीं समझना चाहिए। उनका कहना है, मैं सभी महिलाओं से कहना चाहूंगी कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता। अगर मैं रेहड़ी पर ढाबा चला सकती हूं, तो कोई भी महिला किसी भी क्षेत्र में काम कर सकती है। हमें खुद के पैरों पर खड़े होने का प्रयास करना चाहिए।

भविष्य की योजनाएं

निशा अब अपने ढाबे को एक छोटे रेस्तरां के रूप में विकसित करना चाहती हैं। मेरा सपना है कि मैं एक ऐसा छोटा रेस्तरां खोलूं जहां और भी महिलाएं काम कर सकें। मैं चाहती हूं कि मेरी तरह और भी महिलाएं आत्मनिर्भर बनें, वह भविष्य की योजनाओं के बारे में बताती हैं।
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निशा की यह प्रेरणादायक कहानी साबित करती है कि इच्छाशक्ति और मेहनत से हर मुश्किल पर विजय पाई जा सकती है। उनका संघर्ष न सिर्फ उनके परिवार के लिए प्रेरणा है, बल्कि उन सभी महिलाओं के लिए एक मिसाल है जो आर्थिक तंगी के बावजूद हिम्मत नहीं हारतीं।
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