संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने सोपोर के एक निवासी के खिलाफ जारी लेवी वारंट रद्द कर दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि कोई भी एग्जीक्यूटिंग कोर्ट (फैसले को लागू करने वाला कोर्ट) सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 47 के तहत उठाई गई आपत्तियों पर पहले फैसला किए बिना कोई भी जबरदस्ती वाला कदम नहीं उठा सकता।
यह याचिका फिरोज अहमद डार ने दायर की थी। इसमें श्रीनगर के दूसरे अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के उस आदेश को चुनौती दी गई थी जिसमें मैसर्स हिमालयन मोटर्स के पक्ष में पारित एकतरफा धन डिक्री को लागू करने के लिए लेवी वारंट जारी किए गए थे।
इस मामले की सुनवाई करते हुए, न्यायमूर्ति वसीम सादिक नरगल की पीठ ने टिप्पणी की कि सीपीसी की धारा 47 यह अनिवार्य करती है कि किसी डिक्री के निष्पादन, मुक्ति या संतुष्टि से संबंधित सभी सवालों का फैसला स्वयं एग्जीक्यूटिंग कोर्ट की ओर से ही किया जाना चाहिए।