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मस्जिद हत्याकांड में अदालत का फैसला: पूर्व उग्रवादी को उम्रकैद, कोर्ट ने कहा- इबादत की जगह हिंसा बर्दाश्त नहीं

Mon, 10 Aug 2026 03:26 PM IST
Nikita Gupta अमर उजाला नेटवर्क, श्रीनगर

सार

श्रीनगर की अदालत ने 2020 में मस्जिद के अंदर पूर्व आतंकी संगठन प्रमुख अब्दुल गनी डार की हत्या के दोषी पूर्व उग्रवादी गुलाम मोही-उद-दीन डार को उम्रकैद की सजा सुनाई।
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lawyer advocate and court - फोटो : adobestock
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विस्तार
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श्रीनगर की एक अदालत ने वर्ष 2020 में मस्जिद के अंदर पूर्व आतंकी संगठन प्रमुख अब्दुल गनी डार उर्फ 'अब्दुल्ला गजाली' की हत्या के मामले में पूर्व उग्रवादी गुलाम मोही-उद-दीन डार (60) को उम्रकैद की सजा सुनाई है। अदालत ने कहा कि इबादत की जगह पर हिंसा किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं की जा सकती।

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प्रधान सत्र न्यायाधीश हक नवाज जरगर ने छह अगस्त को सुनाए अपने 12 पन्नों के फैसले में कहा कि इस तरह की घटनाएं सामाजिक सौहार्द, आपसी सम्मान और सांप्रदायिक शांति के मूल्यों को चोट पहुंचाती हैं और इनकी कड़ी न्यायिक निंदा जरूरी है।

अदालत ने डार पर 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। सजा में वह अवधि भी शामिल की जाएगी जो आरोपी पहले ही हिरासत में बिता चुका है। दोषी को उधमपुर जिला जेल में रखा जाएगा।

2020 में मस्जिद के अंदर हुई थी हत्या
अब्दुल गनी डार उर्फ 'अब्दुल्ला गजाली' (78) प्रतिबंधित आतंकी संगठन तहरीक-उल-मुजाहिदीन के पूर्व प्रमुख थे। 13 फरवरी 2020 को श्रीनगर के गवकदल इलाके स्थित जामिया अहल-ए-हदीस मस्जिद के अंदर उनकी बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। हत्या के कुछ दिनों बाद डलगेट निवासी गुलाम मोही-उद-दीन डार को गिरफ्तार किया गया था।

गजाली बडगाम जिले के बीरवाह के रहने वाले थे। वह वर्ष 2011 में जामिया अहल-ए-हदीस के प्रमुख मौलाना शौकत शाह की हत्या के मामले में भी सह-आरोपी थे। मौलाना शौकत शाह की आठ अप्रैल 2011 को इसी मस्जिद के बाहर जुमे की नमाज से पहले हुए विस्फोट में मौत हो गई थी।
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अभियोजन ने मांगी थी फांसी
मामले में अभियोजन पक्ष ने दोषी के लिए मृत्युदंड की मांग की थी। अभियोजन के अनुसार मस्जिद के अंदर गजाली पर लगातार मुक्कों और लातों से हमला किया गया और उनके सिर तथा चेहरे पर भी वार किए गए। इसके बाद उनका सिर सीमेंट के एक खंभे से टकराया गया जिससे मौके पर ही उनकी मौत हो गई।

हालांकि अदालत ने कहा कि मस्जिद के अंदर हुई हत्या इस मामले की गंभीरता बढ़ाने वाली परिस्थिति है, क्योंकि इबादत की जगह लोगों को शांतिपूर्ण और सुरक्षित वातावरण देने के लिए होती है। फिर भी अदालत ने माना कि यह मामला कानूनी तौर पर ‘दुर्लभतम से दुर्लभ’ श्रेणी में नहीं आता, इसलिए मृत्युदंड देना उचित नहीं होगा।

परिवार को 7 लाख रुपये मुआवजा
अदालत ने जम्मू-कश्मीर राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के माध्यम से मृतक के आश्रितों को 7 लाख मुआवजा देने का भी निर्देश दिया है। अदालत ने परिवार की कठिन परिस्थितियों को ध्यान में रखा जिसमें देखभाल की जरूरत वाला एक दिव्यांग बच्चा भी शामिल है। यह राशि तीन महीने के भीतर देने का आदेश दिया गया है।

अदालत ने कहा कि न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल अपराधी को सजा देना नहीं, बल्कि सभ्य समाज के मूल्यों की रक्षा करना भी है। व्यक्तिगत विवाद और मतभेदों के लिए किसी पूजा स्थल में कोई जगह नहीं होनी चाहिए।
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