स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन से बचने के लिए लिया गया अवार्ड लोक नीति के खिलाफ
संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने वीरवार को 2014 के नेशनल लोक अदालत अवार्ड को रद्द करने के फैसले को बरकरार रखा। इस अवार्ड में गांदरबल के राखी रबीतर में 147 कनाल 4 मरला जमीन को एक महिला के नाम किया गया था। कोर्ट ने कहा कि यह अवार्ड सांठ-गांठ से हासिल किया गया था और लोक नीति के खिलाफ है।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव कुमार और न्यायमूर्ति मोहम्मद यूसुफ वानी की डिवीजन बेंच कोर्ट ने कहा कि अचल संपत्ति का स्वामित्व सिर्फ एग्रीमेंट टू सेल और लोक अदालत के समझौते के आधार पर ट्रांसफर नहीं किया जा सकता। इसके लिए रजिस्टर्ड सेल डीड और जरूरी स्टाम्प ड्यूटी का भुगतान अनिवार्य है। 2010 में एक एग्रीमेंट टू सेल हुआ, जिसे सफिया अख्तर ने संसर सिंह के अटॉर्नी होल्डर के रूप में किया था। 2014 में अपीलकर्ता ने सिविल सूट दायर कर जमीन पर मालिकाना हक और अनिवार्य निषेधाज्ञा मांगी। मुकदमे में प्रतिवादियों ने दावा स्वीकार कर लिया और 6 दिसंबर 2014 को नेशनल लोक अदालत में समझौता हो गया। लोक अदालत ने अपीलकर्ता को पूरी जमीन का मालिक और कब्जाधारी घोषित कर दिया।
कोर्ट की टिप्पणी : बेंच ने कहा कि 2014 का सिविल सूट ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट, रजिस्ट्रेशन एक्ट और स्टाम्प एक्ट की जरूरतों को बायपास करने के लिए दायर किया गया था। असली विक्रेता को पार्टी ही नहीं बनाया गया अटॉर्नी होल्डर ने दावा स्वीकार कर लोक अदालत में अवार्ड ले लिया। कोर्ट ने कहा कि लोक अदालत के अवार्ड या समझौता डिक्री का इस्तेमाल रजिस्टर्ड सेल डीड के विकल्प के रूप में नहीं किया जा सकता। इससे स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन शुल्क बचाकर सरकारी खजाने को बड़ा नुकसान होता है। कोर्ट ने कहा अगर लोक अदालत अवार्ड को सेल डीड के विकल्प के रूप में इस्तेमाल कर अचल संपत्ति का स्वामित्व ट्रांसफर किया जाए, तो वह डिक्री कॉन्ट्रैक्ट एक्ट की धारा 23 से प्रभावित होगी और अमान्य होगी।
इसी तरह जो अवार्ड सांठ-गांठ या धोखाधड़ी से स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन से बचने के लिए हो, वह लोकनीति के खिलाफ है और कानूनी रूप से लागू नहीं किया जा सकता। डिवीजन बेंच ने सिंगल जज के फैसले को बरकरार रखते हुए लोक अदालत अवार्ड को नल एंड वॉइड घोषित किया। हालांकि प्रतिवादियों को ट्रायल कोर्ट में पक्षकार बनने की इजाजत दे दी गई। अब ट्रायल कोर्ट सभी पक्षों को सुनकर मामले का फैसला करेगा।