श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने बुधवार को पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती के करीबी युवा नेता वहीद पारा को आतंकी साजिश के मामले में 18 माह बाद एक लाख के निजी मुचलके पर सशर्त जमानत दे दी। पारा को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने नवंबर 2020 में एक आतंकी साजिश के मामले में गिरफ्तार किया था। पारा संभवत: धारा 124 ए (देशद्रोह) के तहत मामलों की सुनवाई पर रोक लगाने वाले सुप्रीम कोर्ट के आदेश से लाभ पाने वाले पहले व्यक्ति बन गए हैं।
उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति संजीव कुमार और न्यायमूर्ति वी सी कौल की खंडपीठ ने पारा को एक लाख रुपये के मुचलके पर जमानत देते हुए पीडीपी नेता पर कई शर्तें रखीं। अदालत ने कहा है कि वहीद अपना पासपोर्ट जांच अधिकारी को सौंप दें। निचली अदालत की पूर्व अनुमति के बिना वह जम्मू-कश्मीर न छोड़ें, साथ ही जब भी आवश्यक हो वह जांच अधिकारी के सामने खुद को पेश करें।
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने पारा की जमानत की अपील मंजूर करते हुए यह भी कहा कि सर्वोच्च अदालत ने इस तरह के मामलों पर सुनवाई की रोक लगाई है। जमानत संबंधी फैसले को भी इसी आलोक में देखा जा सकता है। कोर्ट में पारा के वकील ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय धारा 124-ए आईपीसी के तहत देशद्रोह के आरोपों के संबंध में निर्देश दिया है कि सभी अदालतें धारा 124-ए के तहत लगाए गए आरोप के संबंध में लंबित मुकदमे, अपील और कार्यवाही को स्थगित रखें।
अदालत ने श्रीनगर सेंट्रल जेल के अधीक्षक से कहा है कि जमानत राशि जमा होने के बाद पारा की रिहाई कर दी जाए बशर्ते वह किसी अन्य मामले में न शामिल हो। अदालत ने पाया कि पारा पर गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम की धारा 15 के तहत आरोप नहीं लगाया गया था।
---
कोर्ट ने कहा, नाकाफी हैं सुबूत
खंडपीठ ने कहा कि पारा के मामले में अभियोजन ने जो सुबूत पेश किए हैं, वे बहुत नाकाफी हैं। इसमें संदेह की गुंजाइश है। ऐसे सुबूतों को देखकर आरोपी की जमानत अर्जी को खारिज नहीं किया जा सकता।