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जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कहा: सजा हमेशा आरोप के अनुपात में हो, दलील को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए

Sat, 23 Apr 2022 02:00 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो अमर उजाला नेटवर्क, श्रीनगर

सार

हाईकोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय के अर्दली की बर्खास्तगी का आदेश रद्द कर सेवाओं को किया बहाल। परिवीक्षाधीन अर्दली को पांच दिन अनधिकृत तौर पर अनुपस्थिति के लिए कर दिया गया था सेवामुक्त। कोर्ट ने कहा- अर्दली कोरोना लक्षण दिखने के बाद नहीं आया, इस दलील को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। 
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highcourt srinagar - फोटो : फाइल
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विस्तार
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जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को परिवार न्यायालय के एक अर्दली की सेवाएं समाप्त करने के सक्षम अधिकारी के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि सजा हमेशा कथित आरोप के अनुपात में होनी चाहिए। एक परिवार न्यायालय के अर्दली शाहनवाज हुसैन को परिवीक्षा अवधि में पांच दिन अनधिकृत रूप से अनुपस्थित पाए जाने के बाद उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गई थीं।

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न्यायमूर्ति अली मोहम्मद माग्रे और न्यायमूर्ति पुनीत गुप्ता की पीठ ने शुक्रवार की शाहनवाज हुसैन की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि अनधिकृत अनुपस्थिति सेवा के स्वत: समाप्ति का आधार नहीं हो सकती भले ही आरोपी परिवीक्षाधीन हो।

शाहनवाज को परिवीक्षा पर रहते हुए पिछले साल सीसीए नियम 1956 के नियम 21(1)(बी) के तहत ड्यूटी से लागातार पांच दिन अनुपस्थित रहने के आरोप में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। हालांकि, अदालत ने पाया कि नियम के तहत सक्षम प्राधिकारी के पास सिर्फ परिवीक्षाधीन व्यक्ति को परिवीक्षा से मुक्त करने का ही अधिकार है वह भी यदि प्रदर्शन संतोषजनक नहीं पाया जाए तब।
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शहनवाज का मामला इस श्रेणी में नहीं आता। सक्षम प्राधिकारी ने अर्दली शाहनवाज द्वारा पेश की गई दलील को भी ध्यान में नहीं रखा। शाहनवाज ने बताया था कि  कोरोना के लक्षण सामने आने के बाद उसने मानक प्रक्रिया का पालन करते हुए दूसरों को संक्रमण से बचाने के लिए ड्यूटी पर नहीं आने का फैसला किया।

अदालत ने कहा कि सक्षम प्राधिकारी को निर्णय लेते समय अर्दली की इस दलील को ध्यान में रखना चाहिए था।अदालत ने कहा कि मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अधिकारियों द्वारा लागू किए गए कानून का प्रावधान एक परिवीक्षाधीन व्यक्ति को उसकी अनधिकृत अनुपस्थिति पर बर्खास्त करने के लिए नहीं कहता है। अर्दली के खिलाफ कार्रवाई अनधिकृत अनुपस्थिति के कारण कार्रवाई की गई है न कि असंतोषजनक प्रदर्शन के कारण। 

शाहनवाज सेवा लाभ का हकदार

हाईकोर्ट ने कहा, इस मामले में एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि प्रतिवादियों ने कथित पांच दिनों अनधिकृत अनुपस्थिति के कारण याचिकाकर्ता को सजा देने में गंभीर गलती की है क्योंकि अनुपस्थिति बर्खास्तगी का आधार नहीं हो सकती। सजा हमेशा कथित आरोप के अनुपात में होनी चाहिए।

कोरोना के लक्षणों के कारण पांच दिनों की कथित अनुपस्थिति को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है और कोई मामूली सजा का सहारा नहीं लिया गया। इसके बाद अदालत ने शाहनवाज के खिलाफ 30 सितंबर 2021 के सेवा बर्खास्तगी के आदेश को रद्द करते हुए उन्हें कानून के तहत सेवा लाभ का हकदार ठहराया। 

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