वयस्क बेटा पिता से गुजारा भत्ते का तभी हकदार है, जब वह शारीरिक अथवा मानसिक रूप से अपने गुजारे योग्य आजीविका कमाने में सक्षम नहीं है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने जम्मू-कश्मीर सीआरपीसी की धारा 488 (1) का उल्लेख करते हुए गुजारा भत्ते से जुड़े निचली अदालत के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका स्वीकृत की।
वर्ष 2018 में पिता ने दो बेटों को 1200-1200 रुपये मासिक गुजारा भत्ता देने से इनकार कर दिया था। इस मामले में ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने गुजारा भत्ता जारी रखने के आदेश दिए थे। 2019 में अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने भी इस आदेश को बरकरार रखा। अब इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है।
हाईकोर्ट में न्यायाधीश संजय धर ने कहा कि धारा 488 (1) में वैधानिक नियम बिल्कुल स्पष्ट हैं। पिता से गुजारा भत्ते की वैधानिक मांग वयस्क होने तक ही की जा सकती है। वयस्क होने पर यदि बेटा शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ है तो उसके पास गुजारा भत्ते का अधिकार नहीं रहता। केवल शारीरिक व मानसिक रूप से अक्षम बेटे को ही पिता से गुजारा भत्ते का हक है।
वैधानिक नियमों में जोड़-घटाव नहीं कर सकते
न्यायाधीश संजय धर ने कहा कि वैधानिक नियम विधायिका बनाती है। इसमें न्यायपालिका जोड़ या घटाव नहीं कर सकती। नियमों में स्पष्टता नहीं है तो न्यायपालिका उसे स्पष्ट करने के लिए व्याख्या कर सकती है, लेकिन जहां नियमों की स्पष्ट व्याख्या की गई हो वहां न्यायपालिका अपनी ओर से शब्द नहीं समाहित नहीं कर सकती। गुजारा भत्ते से संबंधित नियम स्पष्ट हैं, लिहाजा इसकी व्याख्या भी उसी के अनुरूप होनी चाहिए।