श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने वर्ष 2019 में तत्कालीन राज्यपाल प्रशासन द्वारा रद्द की गई खादी ग्रामोद्योग बोर्ड में नियुक्तियों के मामले में नए सिरे से जांच के आदेश दिए हैं। अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रशासन द्वारा अपनाई गई चयन रद्द करने की प्रक्रिया वैसी ही है जैसे किसी व्यक्ति को पहले फांसी पर लटका दिया जाए फिर पूछा जाए कि क्यों न उसे फांसी दी जाए? अदालत ने कहा कि इस मामले में जांच तीन माह में शुरू कर छह माह में समाप्त की जा सकती है।
पीड़ितों की ओर से दाखिल याचिकाओं का निपटारा करते हुए मंगलवार को न्यायमूर्ति अली मोहम्मद मागरे की पीठ ने पहले चयन को रद्द करने और फिर उम्मीदवारों को सुनवाई का मौका देकर सरकार द्वारा उठाए गए कदम को अस्वीकार कर दिया। अदालत ने कहा कि पहली बात जो दिमाग में आती है वह एक बार सरकार ने चयन सूची रद्द कर दी, इसके बाद बोर्ड को निर्देश दिया कि नियुक्तियों को रद्द करने से पहले प्रभावितों को सुनवाई का अवसर प्रदान किया जाए। जाहिर है एक निष्कर्ष पर आने से पहले सुनवाई का अवसर देने के प्रसिद्ध सिद्धांत को औपचारिकता बना दिया गया। नियुक्तियों को रद्द करने से पहले सभी नियुक्तियां अप्रासंगिक, सारहीन और वास्तव में एक मजाक थीं। राज्यपाल प्रशासन ने चयन सूची को रद्द कर नियुक्ति की बुनियाद को ही समाप्त कर दिया। यह फैसला सजा सुनाने से पहले सामने वाले को अपना पक्ष रखने का मौका देने के बुनियादी सिद्धांत का भी उल्लंघन है।
हालांकि सुनवाई के दौरान अदालत ने यह जोड़ा कि कोर्ट किसी भी तरीके से या किसी भी मानक से यह नहीं मानती है कि चयन प्रक्रिया निष्पक्ष रही है या चयन सूची पूरी निष्पक्षता के साथ तैयार की गई। इसके बजाय, कोर्ट केवल मामले से निपटने के लिए अधिकारियों द्वारा अपनाए गए तरीके को अनुचित मान रहा है।
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क्या है मामला
वर्ष 2016 में पीडीपी-भाजपा सरकार के दौरान खादी ग्राम उद्योग बोर्ड (केवीआईबी) में 101 पदों पर अफसरों, कर्मियों की नियुक्तियां हुईं। बाद में पता चला कि इन नियुक्तियों में गड़बड़ी हुई है। सरकार ने इस मामले की जांच करने के लिए गृह विभाग के प्रधान सचिव आरके गोयल के नेतृत्व में जांच कमेटी बनाई। जांच कमेटी ने रिपोर्ट दी कि इसमें घोटाला हुआ है। सीआईडी के एडीजीपी ने भी रिपोर्ट दी कि घोटाला हुआ है। सरकार ने 2018 में इन नियुक्तियों को रद्द कर दिया। इसके बाद कुछ उम्मीदवार कोर्ट पहुंच गए।
मदनी के बेटे ने नहीं दी लिखित परीक्षा
जांच रिपोर्ट में पाया गया कि नियुक्तियां पूरी तरह से अवैध थीं। एक सोची समझी योजना के साथ सबकुछ किया गया। नोटिस निकाला और भर्ती प्रक्रिया का जिम्मा एक निजी कंपनी को दे दिया गया। उम्मीदवारों को इंटरव्यू का समय नहीं दिया गया। 1.4 अनुपात के हिसाब से इंटरव्यू काल होने थे, लेकिन 1.15 के अनुपात से इंटरव्यू के लिए उम्मीदवार चुने गए। प्रभावशाली लोगों के सगे संबंधियों को नौकरी के लिए चुना गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के मामा सरताज मदनी के बेटे आरोट मदनी ने इसके लिए लिखित परीक्षा तक नहीं दी। उसके स्थान पर किसी और ने परीक्षा दी। जो लोग चुने जाने थे, उनके लिए पहले से ही ग्राउंड तैयार था।
डिप्टी सीएमओ के पीआरओ ने मांगे पांच-पांच लाख
जांच में यह भी सामने आया कि तत्कालीन उपमुख्यमंत्री के पीआरओ मुश्ताक अहमद मलिक ने उम्मीदवारों से संपर्क किया। उनकी नियुक्ति के लिए पांच-पांच लाख रुपये मांगे गए। इस समय मुश्ताक श्रीनगर में सरकारी खर्चे पर होटल में रह रहा है।